Sunday, 27 May 2018

मयूर प्रकाश बने मंडी बार एसोसिएशन के प्रधान



मंडी। जिला बार एसोसिएशन के चुनावों में मयूर प्रकाश शर्मा निर्विरोध प्रधान चुने गए। नवनिर्वाचित कार्यकारिणी का शपथ समारोह शनिवार को बार रूम में आयोजित किया गया। जिला बार एसोसिएशन के चुनाव इस वर्ष सर्वसम्मति से आयोजित हुए। जिसमें मयूर प्रकाश शर्मा को प्रधान, तिलक राज पठानिया को उपप्रधान, रूपेश उपाध्याय को महासचिव, सन्नी वर्मा को सहसचिव, शेर सिंह ठाकुर को कोषाध्यक्ष, डी के ठाकुर को लाइब्रेरियन, राज कुमार, संजय कुमार और विनायक शर्मा को सर्वसम्मति से कार्यकारिणी सदस्य चुना गया। चुनाव आयुक्त लोकेश कपूर ने शनिवार को नवनिर्वाचित कार्यकारिणी को शपथग्रहण समारोह में शपथ दिलाई। हालांकि बार एसोसिएशन के चुनाव 26 मई को निर्धारित थे। लेकिन एसोसिएशन की आम सभा में सर्वसम्मति से कार्यकारिणी के पदाधिकारी चुन लेने के कारण यह चुनाव नहीं हो पाया। जिसके चलते शनिवार को चुनाव की बजाय शपथ ग्रहण का समारोह आयोजित किया गया। नवनिर्वाचित प्रधान मयूर प्रकाश शर्मा ने बताया कि अधिवक्ताओं की मांगों को प्राथमिकता के अनुसार पूरा करने के प्रयास किए जाएंगे। उन्होने कहा कि लाइब्रेरी की व्यवस्था सुधारने, ई-लाइब्रेरी स्थापित करने, महिला अधिवक्ताओं के लिए बार रूम में बैठने की व्यवस्था करने, अधिवक्ताओं के बैठने की उचित व्यवस्था व चैंबर बनाने के कार्य उनकी प्राथमिकता होंगे। नवनिर्वाचित कार्यकारिणी की ओर से समीर कश्यप को प्रेस सचिव के रूप में मनोनीत किया गया है। शपथग्रहण समारोह के आयोजन में जिला न्यायलय के न्यायिक अधिकारी तथा बार एसोसिएशन के सदस्य मौजूद रहे।
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Sunday, 13 May 2018

शिकारी की यात्रा...






हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला का बाशिंदा होने के कारण बचपन से ही यहां के दुर्गम पहाड़ों पर स्थित शिकारी, कमरूनाग, पराशर, तुंगा और डायनासर के बारे में सुनता आया हूं। जब भी इन जगहों की यात्रा करके कोई लौटता था तो अपने अनुभवों को जरूर बांटता था। जिससे इनका दीदार अपनी आँखों से करने की इच्छा हमेशा बलवती हो उठती। हालांकि इन जगहों की तस्वीरें अक्सर देख कर आसानी से इन्हें चिन्हित कर लेता था। लेकिन इन्हें देख पाने से लंबे समय तक वंचित रहा। बहुत सालों के बाद सबसे पहले परासर जाने का मौका मिला तो फिर इसके बाद वहां पर तीन-चार बार जाना हुआ। कुछ ही साल पहले अचानक कमरूनाग भी जाने का मौका मिला। उन दिनों किसी प्रकार की ट्रैकिंग के लिए अनफिट महसूस कर रहा था। जब चढ़ना शुरू किया तो यहां की कठिन चढ़ाई ने पहले तो बहुत नकारात्मक भाव पैदा किए लेकिन जब गंतव्य तक पहुंचे तो मन प्रफुल्लित हो उठा। यहां का मनोरम वातावरण मानो दिलो दिमाग में बस कर रह गया। इन स्थलों की यात्रा से यह निष्कर्ष निकला कि भले ही पिक्चर या विडियो या गुगल मैप पर किसी स्थान के बारे में आप कल्पनाएं करने और कागज के फूलों में खूशबू खोजने के लिए स्वतंत्र हो सकते हैं लेकिन असलियत में इनकी मनोरमता का आनंद यहाँ पहुँच कर ही उठाया जा सकता है। उक्त दोनों स्थलों की यात्राएं जिस तरह आक्समिक हुई थी उसी तरह शिकारी की आक्समिक यात्रा का संयोग बना। पत्नी सोनाली ने शनिवार की छुट्टी पर एकतरफा ऐलान का फरमान जारी करते हुए शिकारी जाने का कार्यक्रम थोप दिया और मम्मी जी श्रीमती उज्जवलेश्वरी कश्यप ने भी बिना किसी आपत्ती के हामी भर दी। हालांकि किसी दुर्गम यात्रा के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं था। लेकिन जब कार्यक्रम के टलने की कोई स्थिति सामने नजर नहीं आयी तो फिर इसे अंजाम तक पहुंचाने की तैयारी शुरू कर दी।


शनिवार, 12 मई 2018 को करीब नौ बजे मंडी से बाया तांदी, सरोआ, केलोधार, कांढा होते हुए जंजैहली के लिए रवाना हुए। पंडोह के राष्ट्रीय राजमार्ग से जैसे ही सरोआ सड़क पर आते हैं तो आपेक्षा से दूर सड़क बुरी तरह से टूटी हुई हालत में मिली। कुछ किलीमीटर चलने के बाद टारिंग की हुई सडक के आ जाने से राहत मिलती है। केलोधार में रूक कर घर से लाए परांठों के साथ एक दूकान में चाय पीने के बाद अगली यात्रा शूरू होती है। खूबसूरत देवदार, कैल के पेडों से आच्छादित घाटी आँखों की पुतलियों को भी मानो हरा कर देती हैं। कांढा से आगे तो मानो ऐसा लगता है कि स्वर्ग में आ गए हैं। सारी की सारी सराज घाटी इन दिनों सेब के पेडों पर डाली गई नेट के कारण आच्छादित है। बेटी चीनू और बेटे मितुल के पूछने पर उन्हें बताया जाता है कि यह नेट सेबों को ओलावृष्टि से बचाने के लिए लगाई जाती है। पूरी घाटी सेब के बागीचों से भरी हुई है। इसके अलावा गेहुं, धान और सब्जियों से ढंकी हुई है। जिसमें वहां के जनमानस की कड़ी मेहनत और पसीने की बूंदें मिली हुई है। हर जगह से गुजरते हुए वहां के बारे में सुनी या वहां से संबंधित चर्चाएं यात्रा के दौरान जारी रहती है। बगस्याड़ से गुजरते समय मम्मी जी की वर्षों पुरानी कई यादें उमडती हैं तो थुनाग के नजदीक आते ही आँखें हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के घर और गाँव को खोजना शुरू कर देती है। हालांकि सड़क ठीक है लेकिन अनेकों जगहों पर टारिंग उखड़ गई है। थुनाग के नजदीक ही सड़क की टारिंग का काम जोर शोर से चला है। हमारा वाहन भी टारिंग के कारण लगे जाम में रूक जाता है। टारिंग का यह काम मेरा दोस्त ठेकेदार महेन्द्र करवा रहा है। वयस्त सड़क होने के कारण वाहनों का जमघट बढ़ता जाता है। ऐसे में स्थानीय दबंद टैक्सी चालक टारिंग के उपर से वाहन ले जाने को आमदा हो जाता है। ठेकेदार के रोकने पर वह रूक जाता है लेकिन सबसे आगे अपनी गाडी लगा देता है। इस बीच टीपर पर से तारकोल मिश्रित बजरी लगातार मशीन में पड रही है जहां से यह सड़क पर गिर रही है जिसे बेलचा उठाए मजदूर बिना सांस लिए सडक पर बिखरा रहे हैं। ठेकेदार को तैयार तारकोल-बजरी को सड़क पर बिछाने की जल्दी है। जबकि वाहन चालकों को शीघ्र गंतव्य तक पहुंचने की। इस दोतरफा जल्दबाजी का सारा बोझ निरंतर बेलचा चला रहे मजदूरों के बाजूओं पर आ गया है।
थुनाग, लंबाथाच, पांडव शिला होते हुए जंजैहली की खुली घाटी में पहुंचते हैं। जंजैहली की खूबसूरती को शब्दों से बयां तो कर सकते हैं लेकिन उसे महसूस नहीं कर सकते। उसे महसूस करने के लिए तो वहां आना ही पड़ेगा। जंजैहली से शिकारी की कठिन यात्रा शूरू होती है। जंजैहली-शिकारी मार्ग पर करीब सात किलोमीटर दूर भुलाह नामक खूबसूरत पिकनिक स्थल आता है। हरी-भरी चारागाहें, सायं-2 करती हवाओं के बीच देवदार-कैल के पेड़, पहाड़ी नदियां यात्रा की थकान को छूमंतर कर देती है। शिकारी के लिए जीप योग्य सड़क है। लेकिन जहां से शिकारी करीब छह किलोमीटर दूर रह जाता है वहां तक बसें भी चली जाती हैं। सड़क मार्ग से मंदिर तक करीब साढे चार सौ सीढियां हैं। रास्ते में स्थानीय लोगों ने पर्यटकों की सुविधा के लिए चाय-पान व मंदिर में भेंट चढ़ाने की सामग्री के लिए दुकानें सजा रखी हैं। कुछ दूरी पर आईपीएच विभाग ने पीने के पानी टंकियां भी रखी है। पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर शिकारी माता का मंदिर बना हुआ है। जहां पर भिन्न-2 क्षेत्रों के श्रद्धालु पहुँचे हुए हैं। यहां आने वाले सभी श्रद्धालु और पर्यटक शिकारी माता को नमन करते हुए अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। यहां पर बने मंदिर में छत नहीं है। मंदिर में महिषासुर मर्दिनी, दुर्गा, छिन्नमस्ता और योगिनियों की प्रतिमाएं हैं।
मंदिर परिसर के बाहर एक बोर्ड पर शिकारी माता का इतिहास बताया गया है। जिसके अनुसार हिमाचल प्रदेश के जिला मंडी में समद्र तल से 3359 मीटर की ऊँचाई पर बना माता शिकारी देवी का मन्दिर आज भी लोगों के लिए रहस्य बना हुआ है। आज तक कोई भी इस मन्दिर की छत नहीं लगवा पाया है। स्थानीय पौराणिक कथाकारों का कहना है कि मार्कण्डेय ऋषि ने यहां कई सालों तक तपस्या की थी। उन्ही की तपस्या से खुश होकर माँ दुर्गा शक्ति रूप में स्थापित हुई और बाद में पाण्डवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान यहाँ मन्दिर का निर्माण किया। क्योंकि यह पूरा क्षेत्र वन्य जीवों से भरा पड़ा था। इसलिए शिकारी अक्सर यहां आने लगे। शिकार में सफलता के लिए शिकारी माता से प्रार्थना करते थे। जिसके कारण यह मंदिर शिकारी देवी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मंदिर के बारे में सबसे हैरत करने वाली बात यह है कि इस पर छत नहीं लग पाई है। यहाँ हर साल भारी बरफ गिरती है लेकिन मंदिर में कभी बर्फ नहीं जमती। हालांकि अनेकों बार मंदिर पर छत लगाने की कोशीश की गई है लेकिन कभी भी छत नहीं लग पाई है।
मंदिर से वापसी की यात्रा में एक दूकान में बैठते हैं जहां पर एक ब्रिटिश दम्पति भी बैठे हैं। उनसे बातचीत चलती है तो वह बताते हैं कि पुरूष 68 साल का और महिला 63 साल की हैं। वह बताते हैं कि आठ-दस सीढ़ियां चढ़ने के बाद सांस फूलने लगती है इसलिए रूकना पड़ता है। उन्होने बताया कि यह स्थल बहुंत सुंदर है और वह इसका आनंद उठा रहे हैं। उनके साथ चंडीगढ़ में ट्रैवल एजेंसी चलाने वाला बल्ह क्षेत्र के खांदला गांव का एक युवक है। वह अभिवादन कर अपनी आगे की यात्रा शूरू करते हैं। इसके बाद टेंट से बनी दूकान के मालिक जंजैहली निवासी टेक चंद (काल्पनिक नाम) से बातचीत शुरू होती है। टेकचंद से पूछता हूँ कि जय राम के मुख्यमंत्री बनने के बाद सुना था कि मंदिर के लिए ट्राली (रोप वे) लग रहा है तो उसने पुष्टि करते हुए बताया कि यह थुनाग से लगने की उम्मीद है और इसके बारे में चर्चा चल रही है। टेक चंद ने बताया कि इस साल सर्दियों में बहुत कम बर्फ पड़ी है। यहां पर सिर्फ एक फुट ही बर्फ यहां पर गिरी है जबकि अक्सर यहां 8 से 10 फुट तक बर्फ गिरती थी। कम बर्फ के कारण उसने इस बार अपना टेंट भी लगा ही रहने दिया था। अन्यथा वह इसे हटा देता है। लेकिन वह खुद जंजैहली चला गया था। टेकचंद के मुताबिक मई महीने में होने वाले कुथाल मेले के समय नालों बगैरह में बरफ रहता था। लेकिन इस बार लोगों को यहां पर देखने को नसीब नहीं हो रहा है। टेकचंद ने स्थानीय विधायक और प्रदेश के मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर से उम्मीद जाहिर की है कि वह शिकारी देवी को पर्यटन के लिहाज से विकसित करेंगे। जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार की उम्मीद बंध सके।
मंडी जिला की सरकारी साईट के अनुसार शिकारी देवी मंदिर जंजैहली से 18 किमी दूर है और जीपयोग्य वन मार्ग से जुड़ा हुआ है। यह 3359 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। शिकारी को जाने वाले रास्ते में घने जंगल बहुत खुबसूरत हैं। मंडी जिला की दूसरी सबसे ऊँची चोटी होने के कारण इसे मंडी का ताज (मुकुट) भी कहा जाता है। दूर-2 तक फैले घास के हरे चारागाह, चिताकर्षक सूर्योदय-सूर्यास्त, यहां से चारों ओर दिखने वाली बर्फ से ढंकी खूबूसरत पर्वतमालाएं इस स्थल को प्रकृति से प्रेम करने वालों की प्राथमिकता बना देता है। इस स्थल को करसोग से भी पहुँचा जा सकता है जो मात्र 21 किमी दूर है। शिकारी के लिए चिंढी, करसोग और जंजैहली के विभिन्न क्षेत्रों से ट्रैकिंग की जा सकती है। यहां से 16 किमी की ट्रैकिंग करके कमरूनाग भी पहुंचा जा सकता है। यह रास्ता पहाड़ की चोटी पर दूर-2 तक फैली चारागाहों की बेहद सुंदर दृश्यावली से होते हुए गुजरता है।
यहां कैसे पहुंचें-
मंडी- डडौर- चैलचौक-थुनाग-जंजैहली-शिकारी- 94 किमी.
मंडी-पंडोह-सरोआ-केलोधार-कांढा-थुनाग-जंजैहली
ट्रैक रूट-
शिकारी देवी-बखरोट-चिंढी- 18किमी.
शिकारी देवी-रायगढ़-शंकर देहरा-15किमी.
शिकारी-कमरूनाग-16किमी.
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Thursday, 19 April 2018

आरक्षणः पक्ष, विपक्ष और तीसरा पक्ष का पाठ




हाल ही में आरक्षण के सवाल पर ‘आरक्षणः पक्ष, विपक्ष और तीसरा पक्ष’ पुस्तिका पढ़ी। पुस्तिका के कुछ अंश आपके साथ सांझा करना चाहता हुं।
- देश का बुर्जुआ सत्ताधारी वर्ग जब नौकरियों या उच्च शिक्षा में आरक्षण का लुकमा फेंकते हैं तो पहले से नौकरियों पर आश्रित, मध्यवर्गीय, सवर्ण जातियों के छात्रों और बेरोज़गार युवाओं को लगता है कि आरक्षण की बैसाखी के सहारे दलित और पिछड़ी जातियाँ उनके रोज़गार के रहे-सहे अवसरों को भी छीन रही है। वे इस ज़मीनी हक़ीक़त को नहीं देख पाते कि वास्तव में रोज़गार के अवसर ही इतने कम हो गये हैं कि यदि आरक्षण को एकदम समाप्त कर दिया जाये तब भी सवर्ण जाति के सभी बेरोज़गारों को रोज़गार नहीं मिल पायेगा। इसी तरह दलित और पिछड़ी जाति के युवा यह नहीं देख पाते कि यदि आरक्षण के प्रतिशत को कुछ और बढ़ा दिया जाये और यदि वह ईमानदार और प्रभावी तरीके से लागू कर दिया जाये, तब भी दलित और पिछड़ी जातियों के पचास प्रतिशत बेरोज़गार युवाओं को भी रोज़गार नसीब न हो सकेगा। उनके लिए रोज़गार के जो थोड़े से नये अवसर उपलब्ध होंगे, उनका भी लाभ मुख्यतः मध्यवर्गीय बन चुके दलितों और आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक रूप से प्रभावशाली पिछड़ी जातियों के लोगों की एक अत्यन्त छोटी सी आबादी के खाते में ही चला जायेगा और गाँवों-शहरों में सर्वहारा-अर्द्धसर्वहार का जीवन बताने वाली बहुसंख्यक आबादी को इससे कुछ भी हासिल नहीं होगा।
आरक्षण के विरोधियों से
- आरक्षण विरोधियों का चिन्ता भरा तर्क होता है कि आरक्षण से योग्यता नजरअंदाज हो जाती है। लेकिन उनकी यह चिन्ता एन.आर.आई. कोटे के तहत और कैपिटेशन के आधार पर होने वाले प्रवेश को लेकर नहीं होती और न ही वह इस तरह की अयोग्यता का कभी विरोध करते हैं। क्या अनिवासी भारतीयों और दस-दस लाख रूपये तक कैपिटेशन फीस देकर एडमिशन फीस दे सकने लेने वाले धन्ना सेठों की सभी औलादें प्रतिभाशाली ही पैदा होती हैं। इन संस्थानों में दाख़िले के लिए धनिकों की जमात अपने कुलदीपकों की कोचिंग पर लाखों रूपये ख़र्च कर देती हैं। यदि आप इंसाफ़पसंद हैं और योग्यता को लेकर चिन्तित हैं तो फिर आपने कभी सरकार से इस तरह की माँग क्यों नहीं की कि वह या तो ऐसे प्राइवेट कोचिंग संस्थानों पर रोक लगाकर सभी अभ्यर्थी छात्रों के लिए निःशुल्क या सस्ती कोचिंग की समान व्यवस्था लागू करे या फिर दलितों, अन्य पिछड़ी जातियों और वंचित तबकों के लिए अलग से निःशुल्क कोचिंग का प्रावधान करे ताकि कोई योग्य व्यक्ति महज़ आर्थिक-सामाजिक कारणों से इन संस्थानों से वंचित न रह जाये। शिक्षा मात्र व्यापार या पैसे का खेल होकर रह गयी है। लाख योग्यता हो, पैसे और पहुँच के अभाव में आगे बढ़ पाने की रही-सही सम्भावनाएँ भी लगातार सिकुड़ती जा रही हैं।
- प्रतिवर्ष हज़ारों डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक इस देश की आम जनता के खून-पसीने से अर्जित संसाधनों से डिग्रियाँ हासिल करने के बाद, ज़्यादा से ज़्यादा पैसा पीटने के लिए अमेरिका और यूरोप की राह पकड़ लेते हैं। क्या आपने इस प्रवृति का और इसे बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियों का कभी विरोध किया? जबकि इन्हें डिग्रियाँ दिलाने में अस्सी फीसदी से अधिक ख़र्च सरकारी होता है, जो आम जनता से परोक्ष करों के रूप में वसूली गयी धनराशि से आता है।
आरक्षण के समर्थकों से
- भारतीय समाज में जाति व्यवस्था की नंगी, क्रूर और वीभत्स सच्चाई के मद्देनज़र, यदि भावुकतापुर्ण ढंग से उद्विग्नचित होकर सोचा जाये तो दलितों और पिछड़ों के लिए शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण का फार्मूला न्यायसंगत प्रतीत होता है। लेकिन गहराई से देखने पर यह सपष्ट हो जाता है कि दलितों और पिछड़ी जातियों की वास्तिवक सामाजिक-आर्थिक स्थिति में, वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था के फ़्रेमवर्क के भीतर, आरक्षण या ऐसे किसी भी प्रावधान से कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं होने वाला है। आरक्षण का मूल मन्तव्य सदियों से वंचित-उत्पीड़ित लोगों के आक्रोश की ज्वाला को भड़क उठने से रोकने के लिए उस पर पानी के छींटे मारना मात्र है। शोषित-उत्पीड़ित दलितों और पिछड़ी जातियों के आक्रोश को व्यवस्था-विरोधी विस्फोट के रूप में फूट पड़ने से रोकने के लिए आरक्षण का हथकण्डा एक सेफ़्टीवॉल्व का काम करता है।
- दलितों के लिए शिक्षा और रोज़गार के क्षेत्र में लागू आरक्षण से मात्र इतना फ़र्क़ पड़ा है कि उनके बीचे से एक अत्यन्त छोटा, सुविधाजीवी मध्य वर्ग पैदा हुआ है जो गाँवों और शहरों में निकृत्षटतम कोटि के उजरती गुलामों का जीवन बिताने वाले दलितों से अपने को पूरी तरह काट चुका है। चूँकि उसे भी ऊंची जातियों के हमपेशा लोगों के बीच तरह-तरह से, प्रत्यक्ष-परोक्ष सामाजिक अपमान का सामना करना पड़ता है, इसलिए वह दलितवादी राजनीति के पक्षधर, प्रवक्ता और सिद्धान्तकार की भूमिका बढ़-चढ़कर निभाता है, जिसका चरित्र तमाम गरमागरम बातों के बावजूद, निहायत सुधारवादी है और जो व्यापक दलित आबादी की भावनाओं को भुनाकर मात्र अपना वोट बैंक मज़बूत करने का काम किया करता है। ये पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर ही सुधार की गुंजाइश के लिए लड़ते हैं, चाहे उनके तेवर जितने भी तीखे हों। नंगी सच्चाई यह है कि भारत में जब तक पूँजीवाद रहेगा, तब तक उजरती गुलामी रहेगी और दलितों का (और पिछड़ों का भी) बहुलांश तब तक इन्हीं उजरती ग़ुलामों की क़तारों में शामिल रहेगा। जातिगत आधार पर क़ायम पार्थक्य और शोषण-उत्पीड़न का आधार पहले सामन्तवाद था और आज पूँजीवाद है। इसे समाप्त करने के लिए पूँजीवाद-विरोधी क्रान्तिकारी संघर्ष के अतिरिक्त और कोई भी बुनियादी उपाय नहीं है।
- यदि आरक्षण ही समस्या का समाधान होता तो पंजाब में 37 प्रतिशत आरक्षित नौकरियों में से 30,000, हरियाणा में 47 प्रतिशत आरक्षित नौकरियों में से 10,000, हिमाचल प्रदेश में 47 प्रतिशत आरक्षित नौकरियों में से 6000, बिहार में 50 प्रतिशत आरक्षित नौकरियों में से 62,500, राजस्थान में 49 प्रतिशत आरक्षित नौकरियों में से 41,565 और मध्यप्रदेश में 50 प्रतिशत आरक्षित नौकरियों में से 11,500 पद खाली नहीं पड़े रहते। अनुमानतः देश भर में एक लाख ऐसी सरकारी नौकरियाँ हैं जो आरक्षण के तहत ख़ाली हैं। सच्चाई यह है कि अनुसूचित जातियों-जनजातियों व अन्य पिछड़ी जातियों की बहुसंख्यक आम आबादी की ऐसी आर्थिक-शैक्षणिक स्थिति ही नहीं है कि वह इन नौकरियों के लिए आवेदन कर सके। जो आरक्षित सीटें भरती हैं, वे उनके खाते में ही चली जाती हैं जो पहले से ही मध्य वर्ग में शामिल हो चुके हैं। शैक्षणिक स्थिति में परिवर्तन की रफ़्तार यह है कि आज़ादी के 59 साल बाद भी 79.88 प्रतिशत अनुसूचित जाति के छात्र स्कूली पढ़ाई अधूरी छोड़ देते हैं। उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षित 50 प्रतिशत सीटें खाली रह जाती हैं और आरक्षण के अन्तर्गत दाख़िला लेने वाले 25 प्रतिशत छात्र बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। आरक्षण के समर्थक इन्हीं आँकडों के आधार पर कहेंगे कि इसीलिए आरक्षण को अभी लम्बे समय तक जारी रहना चाहिए और इसके दायरे को भी विस्तारित किया जाना चाहिए। लेकिन हमारा कहना यह है कि इस रफ़्तार से ही यदि आरक्षण का प्रभाव पड़ता रहा तब तो एक शताब्दी बाद भी स्थिति में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं आयेगा। और इससे भी अहम बात यह है कि उदारीकरण-निजीकरण के इस रोज़गारविहीन विकास के दौर में जब सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्रों की नौकरियाँ लगातार कम होती जा रही हैं तो ऐसी स्थिति में आरक्षित नौकरियों का प्रतिशत यदि कुछ बढ़ भी जाये तो आम दलित और पिछड़ों की जीवन स्थितियों में भला इससे क्या फ़र्क़ पड़ने वाला है?
हमारा पक्ष
- आरक्षण चाहे लागू हो या न लागू हो, दलितों और पिछड़ी जाति के ग़रीबों की स्थिति में कोई बुनियादी फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। जाति-प्रश्न के समाधान की दिशा में यह एक छोटा-सा भी क़दम नहीं हैं। आरक्षण का शिगूफ़ा उछालकर शासक वर्ग बहुसंख्यक शोषित-वंचित-उत्पीड़ित आबादी को जातिगत आधार पर विभाजित कर देता है और उस लड़ाई के संगठित होने की प्रक्रिया को भी बाधित कर देता है, जो हमारे समाज के तमाम बुनियादी प्रश्नों के साथ ही जाति-प्रश्न के समाधान की प्रक्रिया को भी आगे बढ़ायेगी और अंजाम तक पहुँचायेगी। आरक्षण का लक्ष्य राहत या सुधार नहीं, बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था को बनाये रखने के लिए एक लुकमा फेंककर जनता को जातिगत आधार पर बाँटना है। इसका समर्थन या विरोध करने वाले जाने-अनजाने एक ही साज़िश का शिकार बन जाते हैं।
- इसलिए, हमारा पक्ष यह है कि हम आरक्षण का न तो समर्थन करते हैं, न ही विरोध। हम इस मुद्दे पर जनता के बँट जाने की स्थिति को ही एक कुचक्र मानते हैं और इसका विरोध करते हैं। शिक्षा और नौकरी में किसी प्रकार का आरक्षण नहीं बल्कि छात्र-युवा आन्दोलन की आज एक ही केन्द्रीय माँग हो सकती है- ‘सभी के लिए समान और निःशुल्क शिक्षा तथा काम करने योग्य हर व्यक्ति के लिए रोजगार’। शिक्षा और रोजगार हम सरकार की ज़िम्मेदारी मानते हैं और जिस व्यवस्था में यह सम्भव न हो सके, उसे उखाड़ फेंकना हम आम जनता के बहादुर बेटे-बेटियों का बुनियादी कर्तव्य मानते हैं। निश्चय ही, इस माँग के लिए लड़ते हुए बीच की कुछ मंज़िलें हो सकती हैं, जब तात्कालिक तौर पर सीटें बढ़ाने, फीसें घटाने या बेरोज़गारी भत्ता जैसी किसी माँग के लिए लड़ा जा सकता है, लेकिन इन माँगों की श्रेणी में भी आज आरक्षण को शामिल नहीं किया जा सकता, खासकर तब जबकि विगत आधी सदी का अनुभव हमारे सामने है।
- साथ ही, क्रान्तिकारी छात्र-युवा आन्दोलन का यह अनिवार्य दायित्व है कि वह जातिगत भेदभाव, पार्थक्य और दलित उत्पीड़न के विरूद्ध लगातार प्रचार और आन्दोलन की कार्यवाई चलाये। जाति-विरोधी आन्दोलन को सामाजिक-सांस्कृतिक स्तरों पर लगातार चलाते हुए इसे स्त्री मुक्ति के प्रशन से भी जोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि जाति-आधारित पार्थक्य व उत्पीड़न, लैंगिक आधार पर क़ायम स्त्रियों के पार्थक्य व उत्पीड़न से जुड़ा हुआ है। स्त्रियों की सामाजिक मुक्ति के साथ ही जाति के भीतर तय करके होने वाले विवाहों की रूढ़ि भी कमज़ोर पड़ेगी, युवा स्त्रियाँ विवाह के मामले में चयन की आज़ादी के लिए संघर्ष करेंगी और ऐसी स्थिति में लाज़िमी तौर पर अन्तरजातीय, अन्तरधार्मिक विवाहों का भी चलन बढ़ेगा। इस रूझान के संकेत पहले भी महानगरीय जीवन में देखने को मिलते थे, जो अब पूँजीवादी विकास के साथ ही आम प्रवृति बनती जा रही है। जाति-विभेद की दीवारों को ढहाने के लिए छात्र-युवा आन्दोलन को एक सामाजिक आन्दोलन के रूप में इस प्रवृति को बढ़ावा देना चाहिए।
- ‘सबके लिए समान एवं निःशुल्क शिक्षा और सबके लिए रोज़गार के समान अवसर’ का नारा जातिगत बँटवारे को समाप्त कर आम जनता के सभी बेटे-बेटियों को एक जुझारू संघर्ष के झण्डे तले एकजुट कर देगा और साथ ही, छात्रों-युवाओं के आन्दोलन को व्यापक मेहनतकश जनता के साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी संघर्ष की धारा के साथ भी जोड़ देगा। इस एकजुटता के बाद ही इस व्यवस्था का ध्वंस करने और ऐसी नयी व्यवस्था का निर्माण करने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है जिसमें उत्पादन, राजकाज और समाज के ढाँचे पर उत्पादन करने वाले वर्ग काबिज़ हो सकेंगे और फ़ैसले की ताक़त वास्तव में उनके हाथों में आ सकेगी।
- रियायतखोरी और पैबन्दसाज़ी की मानसिकता से मुक्त होकर दलित-मुक्ति के प्रश्न और समूची जाति समस्या पर इस पूँजीवादी व्यवस्था की सीमाओं का अतिक्रमण करके सोचने पर ही इनके निर्णायक और अन्तिम समाधान की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। दलितों के लिए राहत के चन्द टुकड़े जुटाने के बजाय, उनमें से कुछ को सफ़ेदपोश बनाकर शेष को झूठी उम्मीद के सहारे लटकाये रहने के बजाय, ज़रूरत इस बात की है कि दलित-मुक्ति की आमूलगामी परियोजना जनमुक्ति की किसी व्यापक क्रान्तिकारी परियोजना के एक अंग के रूप में ही सम्भव हो सकती है।
- भारत की कुल आबादी के करीब 30 प्रतिशत दलित हैं और इनमें से 90 प्रतिशत ग्रामीण और शहरी सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा की क़तारों में शामिल हैं। इनमें यदि पिछड़ी जाति के ग़रीबों और जनजातियों को भी जोड़ दें तो यह कुल आबादी की आधी से भी अधिक हो जायेगी। भारत में समाजवाद के लिए संघर्ष तभी आगे बढ़ सकता है, जब आबादी का यह हिस्सा सम्पूर्ण जनता की मुक्ति और स्वतन्त्रता-समानता की वास्तविक स्थापना की परियोजना के रूप में उसे अंगीकार करे। दूसरी ओर, समाजवादी क्रान्ति की परियोजना से जुड़े बिना दलित-मुक्ति का प्रश्न और जाति-विभेद का सम्पूर्ण प्रश्न भी असमाधेय बना रहेगा तथा समाजवाद क्रान्ति को जीवन के हर क्षेत्र में दीर्घावधि तक लगातार चलाये बिना समाज को उस मुक़ाम तक पहुँचाया ही नहीं जा सकता जब जाति, धर्म या लिंग के आधार पर किसी भी तरह की असमानता या उत्पीड़न बचा ही नहीं रह जायेगा।
इस पुस्तिका का प्रकाशन राहुल फ़ाउण्डेशन, 69, बाबा का पुरवा, पेपरमिल रोड, निशातगंज, लखनऊ-226006 ने किया है और आह्वान कैम्पस टाइम्स के सम्पादक मण्डल ने सम्पादन किया है।
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Tuesday, 17 April 2018

वी. आई. लेनिन की पुस्तक साम्राज्यवाद का पाठ



बीसवीं सदी के महान क्रान्तिकारी चिंतक वी.आई. लेनिन द्वारा लिखी गई यह पुस्तक इस सदी की सर्वाधिक महत्वपुर्ण पुस्तकों में है। इस पुस्तक का महत्व इसमें दिए गए आंकड़ों में नहीं निहित है, इसका महत्व इस वजह से भी नहीं है कि इसमें साम्राज्यवाद और विश्वयुद्ध की व्याख्या की गई है। वास्तव में इसका महत्व इस बात में है कि मार्क्सवाद की पुनर्रचना के लिए इसमें सुदृढ़ ढांचा मुहैया कराया गया है जो बीसवीं सदी के बाकी समय में क्रान्तिकारी व्यवहार का मूल आधार बना है।
इस संस्करण की भूमिका प्रसिद्ध मार्क्सवादी अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने लिखी है। इसमें लेनिन की इस पुस्तक को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखने की उन्होने कोशीश की है। बीसवीं सदी में क्रान्तिकारी आचरण पर इसके प्रभाव की उन्होंने व्याख्या भी की है और इस को लेकर जो बहस होती रही है, उसमें लेनिन का यह सिद्धांत कहां खड़ा है, इसकी भी उन्होंने व्याख्या की है।
पुस्तक के दसवें अध्याय ‘इतिहास में साम्राज्यवाद की जगह’ में से कुछ अंश उदधृत करना चाहता हुँ...
- साम्राज्यवाद का आर्थिक सारतत्व है एकाधिकारी पूंजीवाद। यह तथ्य खुद ही इतिहास में साम्राज्यवाद की जगह तय कर देता है। मुक्त प्रतियोगिता की सरज़मीं पर और मुक्त प्रतियोगिता से ही उभरने वाला एकाधिकार पूंजीवादी व्यवस्था से एक ऊंची सामाजिक आर्थिक व्यवस्था में संक्रमण का सूचक है। एकाधिकार के चार मुख्य रूप हैं यानि एकाधिकारी पूंजीवाद चार मुख्य रूपों में प्रकट होता है। ये चारों इस जमाने की चारित्रिक विशेषताएं हैं और हमें उन पर खास तौर पर गौर करना चाहिए।
- पहली बात है कि एकाधिकार की परिघटना उत्पादन के संकेंद्रण की एक बहुत ऊंची अवस्था में उभरी। यह अवस्था है पूंजीपतियों के एकाधिकारी संघों, कार्टेलों, सिंडिकेटों और ट्रस्टों के गठन की अवस्था। हमने देखा है कि समकालीन आर्थिक जीवन में ये कितनी महत्वपुर्ण भूमिका निभाते हैं। बीसवीं सदी की शुरूआत में उन्नत देशों में एकाधिकारी संघों ने अपना वर्चस्व बखूबी कायम कर लिया था।
- दूसरी बात है कि एकाधिकारी संघों ने कच्चे माल के सबसे महत्वपुर्ण स्त्रोतों और खास तौर पर कोयला और लोहा उद्योग के कच्चे माल के स्त्रोतों पर कब्जे को बढ़ावा दिया है। ये दोनों उद्योग पूंजीवादी समाज के अंतर्गत बुनियादी अहमियत रखते हैं और इन दोनों ही में कार्टेलों का गठन सबसे ज्यादा हुआ है। कच्चे माल के सबसे महत्वपुर्ण स्त्रोतों पर एकाधिकार ने बड़ी पूंजी की ताकत को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है। साथ ही इसने कार्टेलों में संगठित उद्योगों और कार्टेलों के बाहर के उद्योगों के बीच के आपसी तनावों को भी बहुत उग्र बना दिया है।
- तीसरी बात है कि एकाधिकार की परिघटना बैंकों से उभरी है। पहले बिचौलिए का काम करने वाले छोटे-मोटे उपक्रमों से बढ़कर बैंक आज वित्तीय पूंजी के एकाधिकारी बन गए हैं। प्रमुख पूंजीवादी देशों में से हर देश में तीन से पांच सबसे बड़े बैंकों ने उद्योंगों और बैंकों की पूंजी के बीच बड़ा नजदीकी जुड़ाव कायम कर लिया है। उन्होंने अरबों-अरब की रकम पर नियंत्रण कायम कर लिया है। यह रकम संबद्ध देशों की समस्त पूंजी और आमदनी का अधिकांश है। इस एकाधिकार की सबसे ज्वलंत अभिव्यक्ति है वित्तीय अल्पतंत्र। यह वित्तीय अल्पतंत्र आधुनिक बुर्जुआ समाज के तमाम आर्थिक और राजनीतिक संस्थानों पर निर्भरता के संबंधों का एक घना जाल बिछा देती है।
- चौथी बात है कि एकाधिकार की परिघटना उपनिवेशवाद की नीति से उभरी है। उपनिवेशवाद की नीति के अनेक पुराने मकसदों के साथ वित्तीय पूंजी ने एक नया मकसद भी जोड़ दिया है। यह है कच्चे माल के स्त्रोतों पर कब्जा करने के लिए, पूंजी के निर्यात के लिए, मुनाफे के सौदों, रियायतों, एकाधिकारी मुनाफों वगैरह के लिए प्रभाव क्षेत्रों यानि कुल मिलाकर आर्थिक इलाकों पर कब्जे के लिए संघर्ष। मिसाल के तौर पर 1876 में अफ्रीका के कुल क्षेत्रफल का करीब दसवां हिस्सा यूरोप के प्रमुख देशों का उपनिवेश था। लेकिन 1900 तक अफ्रीका के नब्बे फीसदी इलाके पर औपनिवेशक देशों का कब्जा कायम हो गया। इसके साथ ही सारी दुनिया का बंटवारा पूरा हो गया। तब अनिवार्य रूप से उपनिवेशों पर एकाधिकारी मिल्कीयत कायम करने की शुरूआत हुई। फलस्वरूप दुनिया के विभाजन और पुनर्विभाजन के लिए साम्राज्यवादी देशों के बीच खासतौर पर भीषण संघर्ष का जमाना शुरू हुआ। यह तो सामान्यतः एक जानी हुई बात है कि एकाधिकारी पूंजीवाद ने पूंजीवाद के अंतर्विरोध को किस कदर उग्र बना दिया है। इस संदर्भ में मंहगाई और कार्टेलों के अत्याचारों का ही जिक्र करना काफी होगा। पूंजीवाद के अंतर्विरोधों का इस कदर उग्र हो जाना वित्तीय पूंजी की विश्वव्यापी अंतिम विजय के समय से शुरू हुए इतिहास के संक्रमणकालीन युग की सबसे प्रबल चालक शक्ति साबित हुई है।
- एकाधिकार, अल्पाधिकार, स्वतंत्रता हासिल करने के बजाए वर्चस्व कायम करने की कोशिश और गिने-चुने सबसे धनी और ताकतवर देशों द्वारा छोटे या कमजोर देशों की बढ़ती संख्या के शोषण ने साम्राज्यवाद की उन चारित्रिक विशेषताओं को जन्म दिया है जो हमें उसे परजीवी या पराभवी पूंजीवाद कहने पर मजबूर करते हैं। साम्राज्यवाद की एक प्रवृति के रूप में लगानजीवी राजसत्ता यानी सूदखोर राजसत्ता का स्वरूप दिनों दिन उभरता जाता है। इस राजसत्ता के तहत पूंजी के निर्यात से होने वाली आमदनी से बुर्जुआ वर्ग की दौलत बढ़ती रहती है। यह समझना एक भूल होगी कि पूंजीवाद के पराभव की इस प्रवृति का मतलब यह है कि पूंजीवाद का तेज रफ्तार से विकास अब असंभव है। ऐसा नहीं होता। कुल मिला कर पूंजीवाद का विकास पहले की अपेक्षा बहुत ज्यादा तेजी से हो रहा है। लेकिन यह विकास आम तौर पर अधिकाधिक असमान ही होता जा रहा है। साथ ही उसकी यह असमानता खास तौर पर पूंजी के मामले में सबसे धनी देशों के पराभव के रूप में सामने आ रही है।
- यह वित्तीय पूंजी बड़ी असाधारण तेजी के साथ बढ़ी है और आज वह तेजी के साथ उपनिवेशों पर कब्जा करने में लगी है। इसके लिए वह हिंसक तरीकों का भी इस्तेमाल कर रही है। लेकिन वह उपनिवेशों पर कब्जे के लिए अधिक प्रशांत तरीकों का सहारा लेने की इच्छा नहीं रखती तो इसकी वजह ही यही है कि वह खुद भी बड़ी तेज रफ्तार से बढ़ी है। आखिरकार उपनिवेशों को उसे अधिक समृद्ध देशों से छीनना पड़ेगा और यह महज शांतिपूर्ण तरीकों से ही नहीं होगा।
- उद्योग की विभिन्न शाखाओं में से किसी एक शाखा में और विभिन्न देशों से किसी एक देश में पूंजीपतियों को मिलने वाला एकाधिकारी मुनाफा उन्हें इतने आर्थिक साधन मुहैया करवा देता है कि वे मजदूरों के कुछ तबकों को और कुछ समय तक तो मजदूरों की काफी बड़ी अल्पसंख्या को रिश्वत देकर उन्हें अन्य तमाम उद्योगों और देशों के खिलाफ किसी उद्योग विशेष या किसी देश विशेष के बुर्जुआ वर्ग की ओर मिला लें। इस लालसा को और बढ़ाता है दुनिया के बंटवारे के लिए साम्राज्यवादी देशों के बीच विग्रहों का उग्र होना। और इस तरह साम्राज्यवाद और अवसरवाद के बीच एक रिश्ता बन जाता है।
- साम्राज्यवाद के आर्थिक सारतत्व पर इस पुस्तक में जो भी कहा गया है उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि हमें उसे संक्रमणशील पूंजीवाद या ज्यादा सही होगा कि मरणासन्न पूंजीवाद के रूप में पारिभाषित करना चाहिए।

पुस्तक का प्रकाशन ग्रंथ शिल्पी (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड, बी-7, सरस्वती कामप्लेक्स, सुभाष चौक, लक्ष्मी नगर, दिल्ली 110092 ने किया है। फोनः 65179059, 22025140.
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Tuesday, 10 April 2018

मुफ्त कानूनी मदद के बारे में जागरूक किए ग्रामीण




मंडी। जिला मुख्यालय के साथ लगती ग्राम पंचायत दुदर भ्रौण में रविवार को जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से विधिक साक्षरता शिविर का आयोजन किया गया। शिविर की अध्यक्षता प्राधिकरण के सचिव मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी अरविंद कुमार ने की। इस अवसर पर उन्होने जानकारी देते हुए बताया कि विभिन्न राज्यों में लोगों को मुफ्त कानूनी सहायता देने के लिए अलग-2 नियम बनाए गए हैं। हिमाचल प्रदेश में यह नियम इस तरह से बनाए गए हैं कि इसका फायदा प्रदेश की करीब 95 प्रतिशत जनता उठा सकती है। उन्होने बताया कि प्राधिकरण की ओर से सभी महिलाओं, बच्चों, अनुसूचित जाति व जनजाति, वरिष्ठ नागरिकों, फैक्टरी मजदूरों, अपंगों, आपदा प्रभावितों, गिरफ्तार व्यक्तियों सहित एक लाख रूपये की सालाना आमदनी वाले सभी लोगों को यह सहायता दी जाती है। मुफ्त कानूनी सहायता के तहत लोगों को वकील मुहैया करवाने के अलावा, गवाहों और दस्तावेजों का खर्चा दिया जाता है। यह सहायता प्राप्त करने के लिए न्यायलयों में बनाए गए फ्रंट आफिस में सादे कागज पर आवेदन किया जा सकता है। यह सहायता न केवल केस दायर करने के लिए दी जाती है बल्कि केस का बचाव करने के लिए भी दी जाती है। इसके अलावा उन्होने देश के संविधान, विधिक सेवा प्राधिकरण की विभिन्न योजनाओं तथा रोजमर्रा के जीवन में प्रयोग होने वाले विभिन्न कानूनों के बारे में प्रकाश डाला। इस मौके पर अधिवक्ता समीर कश्यप ने मनरेगा, सूचना का अधिकार, ग्रामीण संरक्षण एवं सहायता केन्द्र और मध्यस्थता (मिडिएशन) के बारे में बताया। जबकि अधिवक्ता ललित ठाकुर ने मोटर वाहन, घरेलु हिंसा और उपभोक्ता अधिनियम के बारे में जानकारी दी। पंचायत की प्रधान धर्मा देवी ने मुख्य अतिथि सहित विधिक सेवा प्राधिकरण का स्वागत करते हुए शिविर आयोजित करने के लिए धन्यावाद किया। इस अवसर पर पंचायत उपप्रधान विजेन्द्र चंदेल, वार्ड सदस्य, राजेन्द्र, नरेश, पुर्व उपप्रधान रूप सिंह गुलेरिया, नागेन्द्र सिंह पटियाल, ग्राम सुधार सभा छपौण के भगत सिंह गुलेरिया, चेत राम, दुदर और बडोग के महिला मंडल, जिला विधिक प्राधिकरण के ओमप्रकाश, सतीश कुमार, जोगिन्द्र वर्मा सहित करीब दो सौ स्थानीय वासी मौजूद थे।
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मंडी में बनाया जाए आधुनिक पुस्तकालयः शहीद भगत सिंह विचार मंच

मंडी। प्रदेश की सांस्कृतिक और बौद्धिक राजधानी मंडी में आधुनिक और बेहतरीन पुस्तकालय के निर्माण की मांग की गई है। इस संदर्भ में शहर की संस्...