Tuesday, 17 April 2018

वी. आई. लेनिन की पुस्तक साम्राज्यवाद का पाठ



बीसवीं सदी के महान क्रान्तिकारी चिंतक वी.आई. लेनिन द्वारा लिखी गई यह पुस्तक इस सदी की सर्वाधिक महत्वपुर्ण पुस्तकों में है। इस पुस्तक का महत्व इसमें दिए गए आंकड़ों में नहीं निहित है, इसका महत्व इस वजह से भी नहीं है कि इसमें साम्राज्यवाद और विश्वयुद्ध की व्याख्या की गई है। वास्तव में इसका महत्व इस बात में है कि मार्क्सवाद की पुनर्रचना के लिए इसमें सुदृढ़ ढांचा मुहैया कराया गया है जो बीसवीं सदी के बाकी समय में क्रान्तिकारी व्यवहार का मूल आधार बना है।
इस संस्करण की भूमिका प्रसिद्ध मार्क्सवादी अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने लिखी है। इसमें लेनिन की इस पुस्तक को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखने की उन्होने कोशीश की है। बीसवीं सदी में क्रान्तिकारी आचरण पर इसके प्रभाव की उन्होंने व्याख्या भी की है और इस को लेकर जो बहस होती रही है, उसमें लेनिन का यह सिद्धांत कहां खड़ा है, इसकी भी उन्होंने व्याख्या की है।
पुस्तक के दसवें अध्याय ‘इतिहास में साम्राज्यवाद की जगह’ में से कुछ अंश उदधृत करना चाहता हुँ...
- साम्राज्यवाद का आर्थिक सारतत्व है एकाधिकारी पूंजीवाद। यह तथ्य खुद ही इतिहास में साम्राज्यवाद की जगह तय कर देता है। मुक्त प्रतियोगिता की सरज़मीं पर और मुक्त प्रतियोगिता से ही उभरने वाला एकाधिकार पूंजीवादी व्यवस्था से एक ऊंची सामाजिक आर्थिक व्यवस्था में संक्रमण का सूचक है। एकाधिकार के चार मुख्य रूप हैं यानि एकाधिकारी पूंजीवाद चार मुख्य रूपों में प्रकट होता है। ये चारों इस जमाने की चारित्रिक विशेषताएं हैं और हमें उन पर खास तौर पर गौर करना चाहिए।
- पहली बात है कि एकाधिकार की परिघटना उत्पादन के संकेंद्रण की एक बहुत ऊंची अवस्था में उभरी। यह अवस्था है पूंजीपतियों के एकाधिकारी संघों, कार्टेलों, सिंडिकेटों और ट्रस्टों के गठन की अवस्था। हमने देखा है कि समकालीन आर्थिक जीवन में ये कितनी महत्वपुर्ण भूमिका निभाते हैं। बीसवीं सदी की शुरूआत में उन्नत देशों में एकाधिकारी संघों ने अपना वर्चस्व बखूबी कायम कर लिया था।
- दूसरी बात है कि एकाधिकारी संघों ने कच्चे माल के सबसे महत्वपुर्ण स्त्रोतों और खास तौर पर कोयला और लोहा उद्योग के कच्चे माल के स्त्रोतों पर कब्जे को बढ़ावा दिया है। ये दोनों उद्योग पूंजीवादी समाज के अंतर्गत बुनियादी अहमियत रखते हैं और इन दोनों ही में कार्टेलों का गठन सबसे ज्यादा हुआ है। कच्चे माल के सबसे महत्वपुर्ण स्त्रोतों पर एकाधिकार ने बड़ी पूंजी की ताकत को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है। साथ ही इसने कार्टेलों में संगठित उद्योगों और कार्टेलों के बाहर के उद्योगों के बीच के आपसी तनावों को भी बहुत उग्र बना दिया है।
- तीसरी बात है कि एकाधिकार की परिघटना बैंकों से उभरी है। पहले बिचौलिए का काम करने वाले छोटे-मोटे उपक्रमों से बढ़कर बैंक आज वित्तीय पूंजी के एकाधिकारी बन गए हैं। प्रमुख पूंजीवादी देशों में से हर देश में तीन से पांच सबसे बड़े बैंकों ने उद्योंगों और बैंकों की पूंजी के बीच बड़ा नजदीकी जुड़ाव कायम कर लिया है। उन्होंने अरबों-अरब की रकम पर नियंत्रण कायम कर लिया है। यह रकम संबद्ध देशों की समस्त पूंजी और आमदनी का अधिकांश है। इस एकाधिकार की सबसे ज्वलंत अभिव्यक्ति है वित्तीय अल्पतंत्र। यह वित्तीय अल्पतंत्र आधुनिक बुर्जुआ समाज के तमाम आर्थिक और राजनीतिक संस्थानों पर निर्भरता के संबंधों का एक घना जाल बिछा देती है।
- चौथी बात है कि एकाधिकार की परिघटना उपनिवेशवाद की नीति से उभरी है। उपनिवेशवाद की नीति के अनेक पुराने मकसदों के साथ वित्तीय पूंजी ने एक नया मकसद भी जोड़ दिया है। यह है कच्चे माल के स्त्रोतों पर कब्जा करने के लिए, पूंजी के निर्यात के लिए, मुनाफे के सौदों, रियायतों, एकाधिकारी मुनाफों वगैरह के लिए प्रभाव क्षेत्रों यानि कुल मिलाकर आर्थिक इलाकों पर कब्जे के लिए संघर्ष। मिसाल के तौर पर 1876 में अफ्रीका के कुल क्षेत्रफल का करीब दसवां हिस्सा यूरोप के प्रमुख देशों का उपनिवेश था। लेकिन 1900 तक अफ्रीका के नब्बे फीसदी इलाके पर औपनिवेशक देशों का कब्जा कायम हो गया। इसके साथ ही सारी दुनिया का बंटवारा पूरा हो गया। तब अनिवार्य रूप से उपनिवेशों पर एकाधिकारी मिल्कीयत कायम करने की शुरूआत हुई। फलस्वरूप दुनिया के विभाजन और पुनर्विभाजन के लिए साम्राज्यवादी देशों के बीच खासतौर पर भीषण संघर्ष का जमाना शुरू हुआ। यह तो सामान्यतः एक जानी हुई बात है कि एकाधिकारी पूंजीवाद ने पूंजीवाद के अंतर्विरोध को किस कदर उग्र बना दिया है। इस संदर्भ में मंहगाई और कार्टेलों के अत्याचारों का ही जिक्र करना काफी होगा। पूंजीवाद के अंतर्विरोधों का इस कदर उग्र हो जाना वित्तीय पूंजी की विश्वव्यापी अंतिम विजय के समय से शुरू हुए इतिहास के संक्रमणकालीन युग की सबसे प्रबल चालक शक्ति साबित हुई है।
- एकाधिकार, अल्पाधिकार, स्वतंत्रता हासिल करने के बजाए वर्चस्व कायम करने की कोशिश और गिने-चुने सबसे धनी और ताकतवर देशों द्वारा छोटे या कमजोर देशों की बढ़ती संख्या के शोषण ने साम्राज्यवाद की उन चारित्रिक विशेषताओं को जन्म दिया है जो हमें उसे परजीवी या पराभवी पूंजीवाद कहने पर मजबूर करते हैं। साम्राज्यवाद की एक प्रवृति के रूप में लगानजीवी राजसत्ता यानी सूदखोर राजसत्ता का स्वरूप दिनों दिन उभरता जाता है। इस राजसत्ता के तहत पूंजी के निर्यात से होने वाली आमदनी से बुर्जुआ वर्ग की दौलत बढ़ती रहती है। यह समझना एक भूल होगी कि पूंजीवाद के पराभव की इस प्रवृति का मतलब यह है कि पूंजीवाद का तेज रफ्तार से विकास अब असंभव है। ऐसा नहीं होता। कुल मिला कर पूंजीवाद का विकास पहले की अपेक्षा बहुत ज्यादा तेजी से हो रहा है। लेकिन यह विकास आम तौर पर अधिकाधिक असमान ही होता जा रहा है। साथ ही उसकी यह असमानता खास तौर पर पूंजी के मामले में सबसे धनी देशों के पराभव के रूप में सामने आ रही है।
- यह वित्तीय पूंजी बड़ी असाधारण तेजी के साथ बढ़ी है और आज वह तेजी के साथ उपनिवेशों पर कब्जा करने में लगी है। इसके लिए वह हिंसक तरीकों का भी इस्तेमाल कर रही है। लेकिन वह उपनिवेशों पर कब्जे के लिए अधिक प्रशांत तरीकों का सहारा लेने की इच्छा नहीं रखती तो इसकी वजह ही यही है कि वह खुद भी बड़ी तेज रफ्तार से बढ़ी है। आखिरकार उपनिवेशों को उसे अधिक समृद्ध देशों से छीनना पड़ेगा और यह महज शांतिपूर्ण तरीकों से ही नहीं होगा।
- उद्योग की विभिन्न शाखाओं में से किसी एक शाखा में और विभिन्न देशों से किसी एक देश में पूंजीपतियों को मिलने वाला एकाधिकारी मुनाफा उन्हें इतने आर्थिक साधन मुहैया करवा देता है कि वे मजदूरों के कुछ तबकों को और कुछ समय तक तो मजदूरों की काफी बड़ी अल्पसंख्या को रिश्वत देकर उन्हें अन्य तमाम उद्योगों और देशों के खिलाफ किसी उद्योग विशेष या किसी देश विशेष के बुर्जुआ वर्ग की ओर मिला लें। इस लालसा को और बढ़ाता है दुनिया के बंटवारे के लिए साम्राज्यवादी देशों के बीच विग्रहों का उग्र होना। और इस तरह साम्राज्यवाद और अवसरवाद के बीच एक रिश्ता बन जाता है।
- साम्राज्यवाद के आर्थिक सारतत्व पर इस पुस्तक में जो भी कहा गया है उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि हमें उसे संक्रमणशील पूंजीवाद या ज्यादा सही होगा कि मरणासन्न पूंजीवाद के रूप में पारिभाषित करना चाहिए।

पुस्तक का प्रकाशन ग्रंथ शिल्पी (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड, बी-7, सरस्वती कामप्लेक्स, सुभाष चौक, लक्ष्मी नगर, दिल्ली 110092 ने किया है। फोनः 65179059, 22025140.
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Tuesday, 10 April 2018

मुफ्त कानूनी मदद के बारे में जागरूक किए ग्रामीण




मंडी। जिला मुख्यालय के साथ लगती ग्राम पंचायत दुदर भ्रौण में रविवार को जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से विधिक साक्षरता शिविर का आयोजन किया गया। शिविर की अध्यक्षता प्राधिकरण के सचिव मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी अरविंद कुमार ने की। इस अवसर पर उन्होने जानकारी देते हुए बताया कि विभिन्न राज्यों में लोगों को मुफ्त कानूनी सहायता देने के लिए अलग-2 नियम बनाए गए हैं। हिमाचल प्रदेश में यह नियम इस तरह से बनाए गए हैं कि इसका फायदा प्रदेश की करीब 95 प्रतिशत जनता उठा सकती है। उन्होने बताया कि प्राधिकरण की ओर से सभी महिलाओं, बच्चों, अनुसूचित जाति व जनजाति, वरिष्ठ नागरिकों, फैक्टरी मजदूरों, अपंगों, आपदा प्रभावितों, गिरफ्तार व्यक्तियों सहित एक लाख रूपये की सालाना आमदनी वाले सभी लोगों को यह सहायता दी जाती है। मुफ्त कानूनी सहायता के तहत लोगों को वकील मुहैया करवाने के अलावा, गवाहों और दस्तावेजों का खर्चा दिया जाता है। यह सहायता प्राप्त करने के लिए न्यायलयों में बनाए गए फ्रंट आफिस में सादे कागज पर आवेदन किया जा सकता है। यह सहायता न केवल केस दायर करने के लिए दी जाती है बल्कि केस का बचाव करने के लिए भी दी जाती है। इसके अलावा उन्होने देश के संविधान, विधिक सेवा प्राधिकरण की विभिन्न योजनाओं तथा रोजमर्रा के जीवन में प्रयोग होने वाले विभिन्न कानूनों के बारे में प्रकाश डाला। इस मौके पर अधिवक्ता समीर कश्यप ने मनरेगा, सूचना का अधिकार, ग्रामीण संरक्षण एवं सहायता केन्द्र और मध्यस्थता (मिडिएशन) के बारे में बताया। जबकि अधिवक्ता ललित ठाकुर ने मोटर वाहन, घरेलु हिंसा और उपभोक्ता अधिनियम के बारे में जानकारी दी। पंचायत की प्रधान धर्मा देवी ने मुख्य अतिथि सहित विधिक सेवा प्राधिकरण का स्वागत करते हुए शिविर आयोजित करने के लिए धन्यावाद किया। इस अवसर पर पंचायत उपप्रधान विजेन्द्र चंदेल, वार्ड सदस्य, राजेन्द्र, नरेश, पुर्व उपप्रधान रूप सिंह गुलेरिया, नागेन्द्र सिंह पटियाल, ग्राम सुधार सभा छपौण के भगत सिंह गुलेरिया, चेत राम, दुदर और बडोग के महिला मंडल, जिला विधिक प्राधिकरण के ओमप्रकाश, सतीश कुमार, जोगिन्द्र वर्मा सहित करीब दो सौ स्थानीय वासी मौजूद थे।
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Monday, 2 April 2018

एससी/एसटी कानून में बदलाव के विरोध में प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजा






मंडी। शहीद भगत सिंह विचार मंच ने एससी/एसटी कानून 1989 में बदलाव पर रोक लगाने के लिए प्रधानमंत्री को उपायुक्त के माध्यम से ज्ञापन प्रेषित किया है। मंच के अनुसार देशभर में बेहद अरक्षित दलित आबादी पर होने वाले अत्‍याचारों के खिलाफ 1989 में बने इस कानून को 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट द्वारा कमजोर करने का फैसला सुनाया गया। कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के बाद अब एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गई है और साथ ही अग्रिम जमानत पर रोक भी हटा दी गई है। मंच का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला साफ तौर पर दर्शाता है कि मोदी सरकार द्वारा आंकड़ों की अनदेखी करते हुए कमजोर दलीलें रखी गई हैं। देशभर में एससी/एसटी कानून के तहत वैसे भी वर्तमान में दलित उत्पीडन के मामले की एफआईआर दर्ज कराना सबसे मुश्किल काम होता है। साथ ही पुलिस प्रशासन का रवैया मामले में सजाओं का प्रतिशत काफी कम कर देता है। यह कहना गल्त है कि कानून का दुरूपयोग होता है। कानून में गलत केस दर्ज कराने पर पीड़ित के विरुद्ध आईपीसी की धारा 182 के अंतर्गत केस दर्ज करके दण्डित करने का प्रावधान पहले से ही है। इसी प्रकार अग्रिम जमानत मिलने तथा उच्च अधिकारियों की अनुमति से ही गिरफ्तारी करने का आदेश इस एक्ट के डर को बिलकुल खत्म कर देगा। हम सभी जानते है कि पहले ही इस एक्ट के अंतर्गत सजा मिलने की दर बहुत कम है। इस प्रकार कुल मिला कर एससी/एसटी एक्ट के दुरूपयोग को रोकने के इरादे से सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गये दिशा निर्देश दलितों की रक्षा की बजाय आरोपी के हित में ही खड़े दिखाई देते हैं जिससे दलित उत्पीड़न की घटनाओं में बढ़ोत्तरी ही होगी। एससी/एसटी कानून 1989 में बदलाव भी पहले से ही दमन-उत्‍पीड़न झेल रही दलित आबादी को और अंधेरे में धकेलेगा। मंच ने मांग की है कि इस कानून में लाए जा रहे बदलावों पर तुरंत रोक लगाई जाए। प्रतिनिधिमंडल में शहीद भगत सिंह विचार मंच के संयोजक समीर कश्यप, सुशील कुमार, खेम चंद, संजय कुमार, नवीन राणा, हुक्म चंद, अंकुश वालिया, वीरेन्द्र कुमार, अमित शर्मा, भारत भूषण, दुर्गा दास, तरूण दीप, नरेन्द्र कुमार, पंकज शर्मा, विनोद ठाकुर, मनीष कटोच, देवी राम, एस के आर्या, नूर अहमद, देश राज, राजकुमार, संजय, दीपक आजाद, कुमी राम, हेम राज, सूरज कुमार, गोपाल, विजय, हंस राज बैंस, देवराज सहित अन्य स्थानीय वासी मौजूद थे।
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Sunday, 1 April 2018

अंबेडकर और दलित आंदोलन का पाठ


हाल ही में आनंद तेलतुमड़े की लिखी किताब ‘अंबेडकर और दलित आंदोलन’ पढ़ी। यह किताब बाबा साहब अंबेडकर के जीवन के कुछ विशेष पहलुओं पर प्रकाश डालती है। इस पुस्तक में अंबेडकर के व्यक्तित्व के कुछ पक्षों को सामने रखा गया है जिससे उनके व्यक्तित्व को समझने में पाठक को मदद मिल सके। दलित आंदोलन के विभिन्न पक्षों को समग्रता में देखने का आग्रह पुस्तक का लेखक करता है। बिना समग्रता में देखे परखे अंबेडकर का सही मुल्यांकन संभव नहीं है। वह अंबेडकरवादियों के समक्ष व्याप्त संकटों और दलित आंदोलन की निराशा के कारणों को सपष्ट करते हुए भावी चुनौतियों को भी सामने रखते हैं। आनंद तेलतुमड़े दलित आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में राज्य, संविधान, लोकतंत्र, समाजवाद, लैंगिक समानता, मार्क्स और साम्यवाद, क्रान्ति, बौद्ध धर्म, राणनीति और कार्यनीति के पहलू, एक आदर्श की अवधारणा, दलितों के आंदोलन के लिए ‘अंबेडकर, और क्रान्तिकारी विचारक के रूप में’ अंबेडकर, पर विमर्श करते हुए दलितों के मुक्ति संघर्ष के सही रास्ते की तलाश करते हैं। यह पुस्तक समाज में मौजूद अतर्विरोधों को सर्वाधिक पीड़ित के दृष्टिकोण से देखने और उनके समाधान के लिए काम करने, भारत में एक लोकतांत्रिक क्रान्ति के लिए अंबेडकर के काम में प्रयुक्त मौलिक खाके की प्रासांगिकता और वैधता पर जोर देती है। पुस्तक का अनुवाद कृष्ण सिंह ने किया है जबकि इसे ग्रंथ शिल्पी (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली ( फोन- 22025140, 65179059) ने प्रकाशित किया है।
आनंद तेलतुमड़े मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेखक, आलोचक और समसामयिक दलित और वामपंथी आंदोलन के विश्लेषक हैं। उनकी ताजा पुस्तकें हैः हिंदुत्व एंड दलितः पर्सपैक्टिव फॉर अंडरस्टैंडिंग कम्युनल प्रैक्सिस (संपादित) और एंटी इंपीरियलिज्म एंड एनहिलेशन ऑफ कास्ट।

अपनी किताब एंटी-इंपीरियलिज्म एंड एनिहिलेशन ऑफ कास्ट् में उन्होंने जातियों के उन्मूलन के लिए एक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया था। पहला, उन्होने पाया कि औपनिवेशिक दौर से 1960 के दशक तक पूंजीवादी हमले के तहत कर्मकांडी जातियां बहुत हद तक कमजोर हुई हैं और इसलिए एक शास्त्रीय पदानुक्रम में जातियों के बारे में बात करना निरर्थक है। समकालीन जातियों को दलितों और गैर दलितों तक समेट दिया गया है। दूसरा, जाति का अंतर्विरोध ग्रामीण क्षेत्रों में अमीर किसानों के वर्ग और ग्रामीण सर्वहारा जो अधिकतर दलितों से ताल्लुक रखते हैं के बीच प्रकट होता है। ये अंतर्विरोध मुख्यतः आर्थिक हितों पर आधारित होते हैं लेकिन वे गैर आर्थिक विरोधों (सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक) अंतर्विरोधों के साथ अधिक सपष्ट होते हैं। अमीर किसान अपनी खुद की जाति के लोगों के साथ अपनी जाति के बंधनों का इस्तेमाल करते हैं जो दलितों और पिछड़ी जातियों के बीच एक जाति संघर्ष में आसानी से बदल सकते हैं। तीसरा, उत्पीड़न के बढ़ते मामलों का कारण दलितों की आंतरिक कमजोरी है (जिसे अंबेडकर द्वारा बहुत पहले 1936 में चिन्हित किया गया था)। राज्य और उसके उपकरणों का धनी किसानों के साथ गठजोड़ दलितों और गैर दलितों के बीच शक्ति की इस विषमता को बढ़ाता है। यह काफी हद तक प्रभावशाली कारक है। चौथा, आमतौर पर समाज के आगे बढ़ते हुए तबकों को राजनीतिक अर्थव्यवस्था के माध्यम से, न कि सांस्कृतिक या नैतिक तरीके से, जाति की बुराई के खिलाफ लोगों को शिक्षित करने का कार्य हाथ में लेना चाहिए। यह उम्मीद की जाती है कि यह अमीर किसानों और उनकी जाति के लोगों, जो दलितों के खिलाफ उनके सैनिक बनने के लिए उनका आदेश मानते हैं, के साथ गठजोड़ को कमजोर करेगा। पांचवां, इसके बावजूद कुछ ऐसे तत्व होंगे जो इन बातों को नहीं समझते और उत्पीड़न में हिस्सा लेते हैं। उनके साथ शारीरिक रूप से निपटे जाने की जरूरत है। यहां वामपंथ के हस्तक्षेप के लिए एक अवसर और साथ ही साथ एक भूमिका सामने आती है। यदि वे दलितों के साथ अपने दल-बल के साथ शामिल होते हैं, यह आसानी से पूरा किया जा सकता है। इस प्रक्रिया का परिणाम यह होगा कि वामपंथ दलितों का विश्वास हासिल कर लेगा और फलस्वरूप जातियों के उन्मूलन की ताकतें मजबूत होंगी। इतना सा काम करिए, और आप खुद को जातियों के उन्मूलन के करीब पाएंगे।
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Thursday, 29 March 2018

बार काउंसिल चुनाव के लिए मंडी न्यायलय में 87% वोटिंग




मंडी। हिमाचल प्रदेश बार कौंसिल के चुनावों में जिला एवं सत्र न्यायलय के अधिवक्ताओं ने भारी संख्या में मतदान किया। जिला न्यायलय के कुल 366 अधिवक्ताओं में से 318 अधिवक्ताओं ने अपने मतदान का प्रयोग किया। इस तरह जिला बार एसोसिएशन में करीब 87 प्रतिशत मतदान हुआ है। बुधवार को प्रदेश भर के न्यायलयों में बार कौंसिल के चुनाव आयोजित हुए। बार कौंसिल के 15 सदस्यों के लिए हुए इस चुनाव में प्रदेश भर की विभिन्न अदालतों से 50 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। जिला न्यायलय से भी इस बार 5 अधिवक्ता चुनाव लड़ रहे हैं। जिनमें बार कौंसिल के पुर्व अध्यक्ष देशराज शर्मा, रूपिन्द्र सिंह, संजय मंडयाल, तरूण पाठक और पाल वर्मा शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि विगत करीब दो माह से बार कौंसिल के चुनावों की प्रक्रिया जारी है। नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद से उम्मीदवार अधिवक्ता प्रदेश भर के न्यायलयों में जाकर अधिवक्ता समुदाय से अपने पक्ष में मतदान करने के लिए चुनाव प्रचार में डटे रहे। बुधवार को जिला सत्र न्यायलय में मतदान केन्द्र बनाया हुआ था। जहां पर निर्वाचन अधिकारी तहसीलदार सदर की निगरानी में शातिपुर्वक मतदान पूरा हुआ। इसके बाद अब मतों को गणना के लिए प्रदेश बार कौंसिल के शिमला स्थित कार्यालय में ले जाया जाएगा। जहां पर आगामी 7 अप्रैल को मतगणना के बाद चुनाव के परिणाम घोषित होंगे। नवनिर्वाचित सदस्यों में से प्रदेश बार कौंसिल के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और बार कौंसिल आफ इंडिया के सदस्य का चयन किया जाएगा।
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Friday, 23 March 2018

भगत सिंह राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी कानून पारित करोः विचार मंच



मंडी। शहीदी दिवस के अवसर पर शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भगतसिंह राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी कानून पारित करने की मांग की है। विचार मंच ने शुक्रवार को देश के प्रधानमंत्री को जिला प्रशासन के माध्यम से इस संबंध में ज्ञापन प्रेषित किया है। शहीद भगत सिंह विचार मंच के संयोजक समीर कश्यप, सदस्य बी आर जसवाल, सुशील चौहान, मनीष कटोच, विनोद ठाकुर, देश राज शर्मा, अमित शर्मा, हुक्म चंद, कमल सैनी, पंकज शर्मा, अंकुश वालिया, रूपिन्द्र सिंह, दीपक ठाकुर, वीरेन्द्र कुमार, नरेन्द्र कुमार, भारत भूषण, सतीश शर्मा, तारा सिंह, नवीन कुमार, डिंपल कुमार, दुर्गा दास, धर्म चंद और प्रीतम ठाकुर की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल ने उपायुक्त मंडी के सहायक उपायुक्त के माध्यम से प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपा है। विचार मंच के अनुसार देश भर में इस समय ‘भगतसिंह राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी कानून’ पारित कराने हेतु अभियान चल रहा है। इस अभियान में शरीक होते हुए मंच ने मांग की है कि ‘हरेक काम करने योग्य नागरिक को स्थायी रोज़गार व सभी को समान और निःशुल्क शिक्षा’ के अधिकार को संवैधानिक संशोधन करके मूलभूत अधिकारों में शामिल किया जाए। इसके अलावा केन्द्र और राज्यों के स्तर पर जिन भी पदों पर परीक्षाएँ हो चुकी हैं उनमें उत्तीर्ण उम्मीदवारों को तत्काल नियुक्तियाँ दी जाए। वहीं पर केन्द्र और राज्यों के स्तर पर तुरन्त प्रभाव से ज़रूरी परीक्षाएँ आयोजित कराके सभी खाली पदों को जल्द से जल्द भरा जाए। अभियान की मांग है कि ‘भगतसिंह राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी कानून’ पारित करके; गाँव-शहर दोनों के स्तर पर 365 दिनों के पक्के रोज़गार की गारण्टी दी जाए और रोज़गार न दे पाने की सूरत में सभी को न्यूनतम 10,000 रुपये प्रतिमाह गुजारे योग्य बेरोज़गारी भत्ता प्रदान किया जाए। अभियान की मांग है कि नियमित प्रकृति के कार्य पर ठेका प्रथा तत्काल प्रतिबन्धित की जाये, सरकारी विभागों में नियमित प्रकृति का कार्य कर रहे सभी कर्मचारियों को स्थायी किया जाये और ऐसे सभी पदों पर स्थायी भर्ती की जाये। शहीद भगत सिंह विचार मंच मंडी ने अभियान से एकजुटता जाहिर करते हुए सरकार से रोज़गार के ज़रूरी सवाल पर विचार करने और इन मांगों पर गंभीरता से विचार करने और भगतसिंह राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी कानून को शीघ्रातिशीघ्र पारित करके लागू करने को कहा है।
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Monday, 5 March 2018

शिवाबदार में विधिक साक्षरता शिविर आयोजित




मंडी। जिला विधिक प्राधिकरण की ओर से रविवार को ग्राम पंचायत शिवाबदार में विधिक साक्षरता शिविर का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायधीश कोर्ट नंबर दो कृष्ण कुमार ने की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि लोगों को उनके रोजमर्रा के जीवन में काम आने वाले कानूनी प्रावधानों की जानकारी देने के मकसद से इन विधिक साक्षरता शिविरों का आयोजन किया जाता है। उन्होने कहा कि संविधान में यह प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति आर्थिक या अन्य किसी आधार पर न्याय हासिल करने से वंचित नहीं रहना चाहिए। इसके लिए प्राधिकरण की ओर से जरूरतमंद लोगों को मुफ्त कानूनी सहायता मुहैया करवाई जाती है। उन्होने बताया कि सभी महिलाओं, अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों, आपदा प्रभावितों, फैक्टरी मजदूरों व अपंग लोगों को यह सहायता दी जाती है। इसके अलावा सामान्य श्रेणी के उन सभी लोगों को जिनकी वार्षिक आय एक लाख रूपये कम हो उन्हें भी यह सहायता दी जाती है। मुफ्त कानूनी सहायता के लिए प्रत्येक न्यायलय में स्थित फ्रंट आफिस में सादे कागज पर आवेदन करना होता है। इसके तहत वादी तथा प्रतिवादी दोनों को सहायता दी जाती है। जिसमें उन्हें मुकद्दमा लड़ने के लिए वकील मुहैया करवाने सहित मुकद्दमे का सारा खर्चा भी प्राधिकरण की ओर से दिया जाता है। उन्होने नशावृति, घरेलू हिंसा अधिनियम, मनरेगा तथा अन्य कानूनी प्रावधानों से स्थानीय वासियों को अवगत करवाया। जबकि शिविर में मौजूद अधिवक्ता समीर कश्यप ने सूचना के अधिकार, उपभोक्ता अधिनियम, ग्रामीण विधिक संरक्षण एवं सहायता केन्द्र और मिडिएशन (मध्यस्थता) के बारे में जानकारी दी। पंचायत की प्रधान इन्द्रा देवी ने मुख्य अतिथी और अधिवक्ता का स्वागत करते हुए उन्हें हिमाचली टोपी पहना कर सम्मानित किया। उन्होने प्राधिकरण की ओर से पंचायत में शिविर आयोजित करने के लिए आभार व्यक्त करते हुए धन्यावाद किया। इस मौके पर पंचायत वार्ड सदस्य सीता देवी, भवना, पुर्व प्रधान खीरामणी सहित महिला मंडल के सदस्य और स्थानिय निवासी मौजूद रहे।
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मंडी में बनाया जाए आधुनिक पुस्तकालयः शहीद भगत सिंह विचार मंच

मंडी। प्रदेश की सांस्कृतिक और बौद्धिक राजधानी मंडी में आधुनिक और बेहतरीन पुस्तकालय के निर्माण की मांग की गई है। इस संदर्भ में शहर की संस्...