Wednesday, 13 May 2015
सापेक्ष
सापेक्ष
मैं तुमसा नहीं हो सकता
नहीं रखो आशाएं मुझसे
मैं जैसा हुं
इसी में सुकून है
इसी में स्वीकार्य है
तुम जैसा होना
संभव नहीं मेरे लिए।
अपनी चाल ढाल, विचार
तुम्हारे अनुरूप बदलना
मुमकिन नहीं मेरे लिए।
मुझे बनाया है
मेरे इतिहास ने
तुम्हारे इतिहास के सापेक्ष।
मत कहो
बदलने के लिए
अपनापन
तुम्हारा होने को।
रहने दो अवस्थित
अपने में
खोजने दो
जीवन यात्रा का मर्म
अर्थ- अनर्थ
अपने औजारों से।
--- समीर कश्यप
13-5-2015
Sameermandi.blogspot.com
Tuesday, 12 May 2015
दुराचार के दोषी को दस साल की कैद
सेक्सुअल औफेंस एक्ट (पोकसो) की धारा 5 सहित भादंस की धारा 376 व 506 के तहत दुराचार और जान से मारने की धमकी का अभियोग साबित होने पर क्रमश: दस और एक साल के कठोर कारावास और 25000 रूपये व एक हजार रूपये जुर्माने की सजा सुनाई है। आरोपी के जुर्माना राशि समय पर अदा न करने पर क्रमश: दो और एक माह के अतिरिक्त कारावास की सजा भुगतनी होगी। इसके अलावा
पीडिता के पक्ष में आरोपी की जुर्माना राशि में से 20 हजार तथा विधिक प्राधिकरण की ओर से 25000 रूपये की राशि बतौर हर्जाना अदा की जाएगी। अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपी नाबालिग पीडिता के चाचा का धर्म भाई था और अक्सर उनके घर आता रहता था। एक अप्रैल 2013 को पीडिता और उसकी सहेली घर के आंगन में खेल रही थी। इसी बीच आरोपी वहां आया और उन्हे गुच्छियां इकठी करने के
लिए जंगल को ले गया। जहां पर आरोपी ने बच्चियों को मोबाइल पर अश्लील कलिपिंगस दिखाई। जिसके बाद आरोपी ने पीडिता के साथ दुराचार किया। जबकि पीडिता की सहेली किसी तरह वहां से भागने में सफल रही। आरोपी ने बच्चियों को धमकी दी थी कि इस बारे में किसी को बताएंगी तो वह उन्हे जान से मार देगा। लेकिन 11 अप्रैल को दोनो बच्चियों का आपस में झगडा हो गया और पीडिता की सहेली
ने घरवालों को दुराचार के बारे में बताने की धमकी दी तो पीडिता रोने लग गई। जिसके बाद परिजनों को घटना के बारे में पता चला तो उन्होने पुलिस थाना में प्राथमिकी दर्ज करवाई थी। पुलिस ने आरोपी को हिरासत में लेकर अदालत में अभियोग चलाया था। अभियोजन पक्ष की ओर से पैरवी करते जिला न्यायवादी आर के कौशल ने 12 गवाहों के माध्यम से आरोपी पर अभियोग को साबित किया। अदालत ने
अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत साक्ष्यों से आरोपी के खिलाफ संदेह की छाया से दूर अभियोग साबित हुआ है। जिसके चलते अदालत ने आरोपी को उक्त कारावास और जुर्माने की सजा का फैसला सुनाया है। Friday, 8 May 2015
चरस तस्करी के दोषी को तीन साल की सजा
निश्चित समय में जुर्माना राशि अदा न करने पर दो माह के अतिरिक्त कारावास की सजा भुगतनी होगी। जिला एवं सत्र न्यायधीश बलदेव सिंह की विशेष अदालत ने जिला कुल्लू की उपतहसील सैंज के घनाणी
हजार रूपये जुर्माने की सजा का फैसला सुनाया है। आरोपी के निश्चित समय में जुर्माना राशि अदा न करने पर दो-दो माह के अतिरिक्त कारावास की सजा भुगतनी होगी। ये सभी सजाएं एक साथ चलेंगी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार सदर थाना पुलिस के दल ने एक मार्च 2010 को बिंद्रावणी के पास अतिरिक्त उप निरिक्षक मेहर सिंह की अगुवाई में नाका लगाया हुआ था। इसी दौरान कुल्लू की ओर से आ रही
एक निजी बस को चैकिंग के लिए रोका गया। चैकिंग के समय सीट नंबर 29 पर बैठा आरोपी पुलिस दल को देखकर घबरा गया। जिस पर पुलिस ने संदेह के आधार पर आरोपी के तलाशी ली तो उसकी
कमर में सैलो टेप से बंधी हुई 350 ग्राम चरस और 90 ग्राम अफीम बरामद हुई थी। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज करके अदालत में अभियोग चलाया था। अभियोजन पक्ष की ओर से पैरवी करते
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Thursday, 7 May 2015
यशस्वी लेखिका कात्यायनी जी को जन्मदिन मुबारक हो।
मंडी। यशस्वी लेखिका कात्यायनी जी का आज जन्मदिन है। साल 1997 के 19 सितंबर को समरहिल स्थित हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में देश की प्रसिद्ध लेखिका कात्यायनी के भाषण की दहाडती गूंज वहां मौजूद श्रोताओं के हृदय में अभी भी गुंजायमान है। जिस तरह से उन्होने अपने भाषण के माध्यम से रेडिकल प्रोबल्मस के रेडिकल स्लयुशन के लिए संघर्षरत होने का आहवान किया था। वह बेहद प्रेरणामयी था। हिमाचल प्रदेश के लोगों के स्वभाव में धीमापन है। पहाडों को फुर्ती से नहीं चढ़ा जा सकता। पहाड चढने के लिए ठहर ठहर कर ही चलना पडता है। इसी से पहाडी मानुष का स्वभाव मैदानी क्षेत्रों की आपेक्षा धीमापन लिए हुए है। लेकिन इस धीमेपन में वातावरण को जज्ब करने की बेहद क्षमता है। करीब डेढ घंटे तक चले कात्यायनी जी के अधिभाषण ने श्रोताओं को पूरी तरह से झकझोर दिया। हालांकि भाषण के उपरांत कार्यक्रम के आयोजक ही खुद कात्यायनी जी की लाइन से खफा हो गये। उनका कहना था कि भाषण में व्यवस्था को फूंक डालो, जला डालो आदि से नक्सलवादी लाइन सामने आ रही थी। लेकिन इस विचार से मेरे सहित विश्वविद्यालय के सहपाठी और युवा लेखक जितेन्द्र निराला भी सहमत नहीं थे। हुआ यह कि कार्यक्रम के बाद आयोजकों ने कन्नी काट दी। लेकिन हम कात्यायनी जी को कैफेट एरिया ले गए। जहां हमने उन्हे चाय पर आमंत्रित किया। इसी दौरान उन्होने मेरी डायरी पर एक कविता लिख कर अभिव्यक्ति दी थी। कविता यह थी कि...ऐसा किया जाय, एक साजिश रची जाय, बारूदी सुरंगे बिछाकर, उड़ा दी जाये, चुप्पी की दुनिया। चायपान के बाद कात्यायनी जी को एडवांस स्टडीस में छोडने के लिए गए। जहां पर प्रसिद्ध लेखक अरूण कमल जी से मुलाकात हुई। अरूण कमल जी को बताया कि मैं कवि दीनू कश्यप जी का बेटा हुँ तो वह बहुत खुश हुए और पिता जी के साथ बिताए अपने समय के संस्मरण बताने लगे। अरूण कमल जी और कात्यायनी जी एडवांस स्टडीस में कार्यवश आए हुए थे। इसका पता चलते ही जितेन्द्र निराला के साथ उन्हे विश्वविद्यालय में अपने विचार रखने के लिए कहने गए थे। अरूण कमल जी की कविता अपना क्या है इस दुनिया में सब तो लिया उधार सारा लोहा उन लोगों का अपनी केवल धार हमारे संगठन के पोस्टरों की कविताओं की मुख्य लेखनी होती थी। ऐसे में अरूण कमल जी का एडवांस स्टडीस में होना हमारे लिए बडा सौभाग्य था। लेकिन अरूण कमल जी के व्यस्त होने के कारण जब कात्यायनी जी से आग्रह करने पर वह सहर्ष विश्वविद्यालय आने को तैयार हो गई थी। कात्यायनी जी का विश्वविद्यालय में आगमन साहित्य प्रेमियों और छात्रों के लिए एक अहम घटना थी। कात्यायनी जी के लेख, कहानियां, बहसें अक्सर हंस सहित अन्य पत्रिकाओं में प्रमुखता में छपती थी। ऐसे में समकालीन परिदृष्य पर लेखन कर रही प्रसिद्ध लेखिका का थोडे समय के लिए ही सानिध्य प्राप्त करना साहित्य के गंभीर पाठकों के लिए अविस्मरणीय क्षण था। कात्यायनी जी की डायरी में लिखी पांच पंक्तियों की लघु कविता हमेशा प्रेरणा देती है। हाल ही में पिता जी ने बताया कि उनके पास कात्यायनी जी के साहित्य का पूरा सेट है। सबसे पहले उनकी पुस्तक कुछ जीवंत कुछ ज्वलंत हाथों में आई है तो इसी को पढना शुरू कर दिया है। अनेकों सवालों के जवाब पुस्तक को पढते हुए मिल रहे हैं। इस पुरानी किताब में जिन बातों का उल्लेख है वह फिर फिर से घटित होकर सामने आ रही हैं और यह आज भी उतनी ही प्रासांगिकता रखती हैं जितनी वह उस समय थी जब यह प्रकाशित हुई थी। जैसे मुंशी प्रेमचंद जी के साहित्य पर हाल ही में किए जाने हमले। लेकिन यह हमले मुंशी प्रेमचंद के समय को सामने रखते हुए उनकी कृतियों की समीक्षा किए बगैर किया जा रहे हैं। इनका स्वरूप समझने के लिए यह पुस्तक बेहद समसामयिक हो जाती है। यह बेहद राहत भरा संयोग है कि जिस लेखिका को हम पुस्तकों में पढते हैं वह अब सोशल मीडिया फेसबुक के माध्यम से साथी भी है। इससे उनकी बौधिकता का अनायास ही सानिध्य मिल गया है। लेकिन लेखक को समझने के लिए सोशल मीडिया ही काफी नहीं है इसके लिए उनकी पुस्तकों तक पहुंच बनाना बेहद जरूरी है।जन्मदिवस के अवसर पर कात्यायनी जी को बहुत-2 बधाई हो। यह वर्ष उनके लिए सृजनशीलता से भरा हुआ और मंगलमय हो। ...sameermandi.blogspot.com
...और साहब ने जुतों के साथ ही कर दी उदघाटन की पूजा अर्चना
मंडी। आज न्यायलय परिसर से गुजर ही रहा था तो देखा कि मंडी का प्रेस किसी कवरेज के लिए तैनात है। पता चला कि आला साहब एक उदघाटन करने आने वाले हैं। थोडी देर में साहब वहां पहुंचे। पूजा के लिए बाकायदा पंडित जी धोती लगाकर उदघाटन स्थल पर मौजूद थे। साहब ने पूजा अर्चना के बाद नारियल फोड कर विधिवत शुभारंभ किया। लेकिन पूजा अर्चना के दौरान साहब अपने जुते उतारना भूल गए। मौका पर मौजूद लोगों ने पत्रकारों का ध्यान इस ओर दिलाया तो कमेंट सुनने को मिला कि आजकल इंस्टेंट जमाना है। हर चीज इंस्टेंट होती है इसलिए पूजा भी अब इंस्टैंट होने लगी है। इसलिए जूते उतारे बगैर भी काम चल पडता है। यह तो ठीक ही कहा कहने वालों ने। अब साहब को दिन भर में अनेकों काम करने को पडे हैं वो कहां जूते उतारने के चक्कर में पडेंगे। वैसे भी पूजा तो मात्र रस्म ही है। इसे निभाने में बडे उद्देश्य आडे नहीं आने चाहिए। जैसे इस उदघाटन से भी लोगों को राहत पहुंचाने का बडा उद्देश्य है। लेकिन क्या यह रस्म अदायगी गल्त परंपराओं का नतीजा नहीं है। एक तो बडे उद्देश्य को देखते हुए रस्म निभाई ही नहीं जानी चाहिए। और अगर रस्मी परंपरा जारी ही रखनी हो तो या इसे ठीक ढंग से निभाया जाना चाहिए। ठीक ढंग से रस्म निभाने का मतलब यह नहीं है कि ठीक ढंग से पूजा कर ली जाए। एक ही धर्म की पूजा नहीं अपितु अन्य सभी धर्मों के अनुरूप भी रस्में निभाई जानी चाहिए। अन्यथा इस धर्म निरपेक्ष देश के नागरिकों में क्या यह संदेश नहीं जाता कि सरकार सिर्फ बहुसंख्यक धर्म को ही सरकारी काम का धर्म मानती है। अन्य धर्मों के नागरिकों में क्या एक असुरक्षा और अपने धर्म की ओर ज्यादा कट्टरवादी होने का संकेत नहीं जाता। जब सरकारी कार्यालयों में एक ही धर्म को तवज्जो दी जाती हो तो अल्पसंख्यकों में यह बात तो घर करेगी ही कि यह देश, सरकार और प्रशासन बहुसंख्यक धर्म को ही पोषित करता है तथा अन्य धर्मों की उपेक्षा। ऐसे में क्या यह नहीं होना चाहिए कि संविधान के मुताबिक धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को मानते हुए किसी धर्म विशेष को तवज्जो नहीं दी जाए। अक्सर सरकारी कार्यालयों में देवी देवताओं के कैलेंडर और धार्मिक प्रतीक देखे जा सकते हैं। ऐसे कार्यालयों में प्रवेश करने वाले अल्पसंख्यक क्या अपने आप को असुरक्षित और अपने कार्य के लिए आशंकित महसूस नहीं करते होंगे। अगर देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को बनाए रखना है तो सरकार व प्रशासन को धर्म विशेष को तवज्जो दिये बगैर या तो सर्वधर्म रस्में करवानी चाहिए या फिर रस्म अदायगी का यह खेल संविधान के प्रावधान के तहत राज्य के कार्यों में धर्म का हस्ताक्षेप न होने के सार को समझते हुए बंद कर देना चाहिए।
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