Thursday, 29 March 2018

बार काउंसिल चुनाव के लिए मंडी न्यायलय में 87% वोटिंग




मंडी। हिमाचल प्रदेश बार कौंसिल के चुनावों में जिला एवं सत्र न्यायलय के अधिवक्ताओं ने भारी संख्या में मतदान किया। जिला न्यायलय के कुल 366 अधिवक्ताओं में से 318 अधिवक्ताओं ने अपने मतदान का प्रयोग किया। इस तरह जिला बार एसोसिएशन में करीब 87 प्रतिशत मतदान हुआ है। बुधवार को प्रदेश भर के न्यायलयों में बार कौंसिल के चुनाव आयोजित हुए। बार कौंसिल के 15 सदस्यों के लिए हुए इस चुनाव में प्रदेश भर की विभिन्न अदालतों से 50 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। जिला न्यायलय से भी इस बार 5 अधिवक्ता चुनाव लड़ रहे हैं। जिनमें बार कौंसिल के पुर्व अध्यक्ष देशराज शर्मा, रूपिन्द्र सिंह, संजय मंडयाल, तरूण पाठक और पाल वर्मा शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि विगत करीब दो माह से बार कौंसिल के चुनावों की प्रक्रिया जारी है। नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद से उम्मीदवार अधिवक्ता प्रदेश भर के न्यायलयों में जाकर अधिवक्ता समुदाय से अपने पक्ष में मतदान करने के लिए चुनाव प्रचार में डटे रहे। बुधवार को जिला सत्र न्यायलय में मतदान केन्द्र बनाया हुआ था। जहां पर निर्वाचन अधिकारी तहसीलदार सदर की निगरानी में शातिपुर्वक मतदान पूरा हुआ। इसके बाद अब मतों को गणना के लिए प्रदेश बार कौंसिल के शिमला स्थित कार्यालय में ले जाया जाएगा। जहां पर आगामी 7 अप्रैल को मतगणना के बाद चुनाव के परिणाम घोषित होंगे। नवनिर्वाचित सदस्यों में से प्रदेश बार कौंसिल के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और बार कौंसिल आफ इंडिया के सदस्य का चयन किया जाएगा।
...sameermandi.blogspot.com

Friday, 23 March 2018

भगत सिंह राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी कानून पारित करोः विचार मंच



मंडी। शहीदी दिवस के अवसर पर शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भगतसिंह राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी कानून पारित करने की मांग की है। विचार मंच ने शुक्रवार को देश के प्रधानमंत्री को जिला प्रशासन के माध्यम से इस संबंध में ज्ञापन प्रेषित किया है। शहीद भगत सिंह विचार मंच के संयोजक समीर कश्यप, सदस्य बी आर जसवाल, सुशील चौहान, मनीष कटोच, विनोद ठाकुर, देश राज शर्मा, अमित शर्मा, हुक्म चंद, कमल सैनी, पंकज शर्मा, अंकुश वालिया, रूपिन्द्र सिंह, दीपक ठाकुर, वीरेन्द्र कुमार, नरेन्द्र कुमार, भारत भूषण, सतीश शर्मा, तारा सिंह, नवीन कुमार, डिंपल कुमार, दुर्गा दास, धर्म चंद और प्रीतम ठाकुर की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल ने उपायुक्त मंडी के सहायक उपायुक्त के माध्यम से प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपा है। विचार मंच के अनुसार देश भर में इस समय ‘भगतसिंह राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी कानून’ पारित कराने हेतु अभियान चल रहा है। इस अभियान में शरीक होते हुए मंच ने मांग की है कि ‘हरेक काम करने योग्य नागरिक को स्थायी रोज़गार व सभी को समान और निःशुल्क शिक्षा’ के अधिकार को संवैधानिक संशोधन करके मूलभूत अधिकारों में शामिल किया जाए। इसके अलावा केन्द्र और राज्यों के स्तर पर जिन भी पदों पर परीक्षाएँ हो चुकी हैं उनमें उत्तीर्ण उम्मीदवारों को तत्काल नियुक्तियाँ दी जाए। वहीं पर केन्द्र और राज्यों के स्तर पर तुरन्त प्रभाव से ज़रूरी परीक्षाएँ आयोजित कराके सभी खाली पदों को जल्द से जल्द भरा जाए। अभियान की मांग है कि ‘भगतसिंह राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी कानून’ पारित करके; गाँव-शहर दोनों के स्तर पर 365 दिनों के पक्के रोज़गार की गारण्टी दी जाए और रोज़गार न दे पाने की सूरत में सभी को न्यूनतम 10,000 रुपये प्रतिमाह गुजारे योग्य बेरोज़गारी भत्ता प्रदान किया जाए। अभियान की मांग है कि नियमित प्रकृति के कार्य पर ठेका प्रथा तत्काल प्रतिबन्धित की जाये, सरकारी विभागों में नियमित प्रकृति का कार्य कर रहे सभी कर्मचारियों को स्थायी किया जाये और ऐसे सभी पदों पर स्थायी भर्ती की जाये। शहीद भगत सिंह विचार मंच मंडी ने अभियान से एकजुटता जाहिर करते हुए सरकार से रोज़गार के ज़रूरी सवाल पर विचार करने और इन मांगों पर गंभीरता से विचार करने और भगतसिंह राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी कानून को शीघ्रातिशीघ्र पारित करके लागू करने को कहा है।
...sameermandi.blogspot.com

Monday, 5 March 2018

शिवाबदार में विधिक साक्षरता शिविर आयोजित




मंडी। जिला विधिक प्राधिकरण की ओर से रविवार को ग्राम पंचायत शिवाबदार में विधिक साक्षरता शिविर का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायधीश कोर्ट नंबर दो कृष्ण कुमार ने की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि लोगों को उनके रोजमर्रा के जीवन में काम आने वाले कानूनी प्रावधानों की जानकारी देने के मकसद से इन विधिक साक्षरता शिविरों का आयोजन किया जाता है। उन्होने कहा कि संविधान में यह प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति आर्थिक या अन्य किसी आधार पर न्याय हासिल करने से वंचित नहीं रहना चाहिए। इसके लिए प्राधिकरण की ओर से जरूरतमंद लोगों को मुफ्त कानूनी सहायता मुहैया करवाई जाती है। उन्होने बताया कि सभी महिलाओं, अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों, आपदा प्रभावितों, फैक्टरी मजदूरों व अपंग लोगों को यह सहायता दी जाती है। इसके अलावा सामान्य श्रेणी के उन सभी लोगों को जिनकी वार्षिक आय एक लाख रूपये कम हो उन्हें भी यह सहायता दी जाती है। मुफ्त कानूनी सहायता के लिए प्रत्येक न्यायलय में स्थित फ्रंट आफिस में सादे कागज पर आवेदन करना होता है। इसके तहत वादी तथा प्रतिवादी दोनों को सहायता दी जाती है। जिसमें उन्हें मुकद्दमा लड़ने के लिए वकील मुहैया करवाने सहित मुकद्दमे का सारा खर्चा भी प्राधिकरण की ओर से दिया जाता है। उन्होने नशावृति, घरेलू हिंसा अधिनियम, मनरेगा तथा अन्य कानूनी प्रावधानों से स्थानीय वासियों को अवगत करवाया। जबकि शिविर में मौजूद अधिवक्ता समीर कश्यप ने सूचना के अधिकार, उपभोक्ता अधिनियम, ग्रामीण विधिक संरक्षण एवं सहायता केन्द्र और मिडिएशन (मध्यस्थता) के बारे में जानकारी दी। पंचायत की प्रधान इन्द्रा देवी ने मुख्य अतिथी और अधिवक्ता का स्वागत करते हुए उन्हें हिमाचली टोपी पहना कर सम्मानित किया। उन्होने प्राधिकरण की ओर से पंचायत में शिविर आयोजित करने के लिए आभार व्यक्त करते हुए धन्यावाद किया। इस मौके पर पंचायत वार्ड सदस्य सीता देवी, भवना, पुर्व प्रधान खीरामणी सहित महिला मंडल के सदस्य और स्थानिय निवासी मौजूद रहे।
...sameermandi.blogspot.com

Sunday, 25 February 2018

शिवरात्रि मेले में दी कानूनी सहायता की जानकारी





मंडी। अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव 2018 के दौरान हजारों लोगों को मुफत कानूनी सहायता के बारे में जानकारी दी गई। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव मुखय न्यायिक दंडाधिकारी अरविंद कुमार ने बताया कि शिवरात्रि महोत्सव के मौके पर पड्डल स्थिल मेला मैदान में कानूनी सेवाओं की जानकारी देने के लिए एक प्रदर्शनी लगाई गई थी। जिसका शुभारंभ जिला एवं सत्र न्यायधीश सी एल कोछड़ ने किया था। इस अवसर पर मंडी न्यायलय के सभी न्यायधीश मौजूद थे। प्रदर्शनी स्थल पर हर रोज विधिक साक्षरता शिविर आयोजित किया गया। जिसमें पैनल अधिवक्ताओं और पैरा लीगल वालंटियर ने लोगों को मुफत कानूनी सहायता के बारे में बताया। उन्होने बताया कि राज्य विधिक प्राधिकरण की ओर से आई मोबाइल वैन में लोक अदालतों का आयोजन किया गया। इसके अलावा वैन के जरिये नजदीकी ग्रामीण क्षेत्रों में भी विधिक जानकारी दी गई और पैंफलेट बांटें गए। प्रदर्शनी स्थल में आयोजित होने वाले विधिक शिविरों में अधिवक्ता समीर कश्यप, निशांत वालिया, सरवण कुमार, विशाल ठाकुर, गीतांजलि शर्मा, चंद्ररेखा, विजय भंडारी, हरित शर्मा, पैरा लीगल वालंटियर भगत राम और दया राम सहित जिला विधिक प्राधिकरण के कर्मी मौजूद रहे।
...sameermandi.blogspot.com

Saturday, 17 February 2018

इतिहास के गवाक्षों से मंडी शिवरात्रि और देव परंपरा





मंडी। हर वर्ष मंडी में आयोजित होने वाले अंतर्राष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव का आगाज़ हो चुका है। महोत्सव का मुख्य आकर्षण मंडी जिला के सराज, चौहार, बदार, सनोर, उत्तरसाल घाटी सहित विभिन्न छोरों से आने वाले सैंकडों देवी-देवताओं का देव समागम होता है। विगत करीब दो सौ सालों से आयोजित होने वाले इस उत्सव में हालांकि बहुत बदलाव आए हैं। लेकिन देव परंपरा का तानाबाना कमोबेश अपने आप को पुनर्उत्पादित करता लगभग वैसा ही चला आ रहा है। दरअसल इस उत्सव के जन्म लेने के दौर की पड़ताल से जाहिर होता है कि वह दौर पहाड़ी रिआसतों के अंतः और आपस में संगठन का दौर था। मंडी रियासत के राजा सूरमा सेन के उतराधिकारी के रूप में ईश्वरी सेन 1788 ए.डी में शासक बने। इस दौर में रियासत के भीतर हो रहे षडयंत्रों के चलते नाबालिग राजा ने कांगड़ा के राजा संसार चंद से सहायता मांगी। लेकिन संसार चंद ने मंडी पर हमला करके इसे लूट लिया और ईश्वरी सेन को बंदी बनाकर सुजानपुर के किले में बंद कर दिया। हालांकि कमलाह का किला जीतने में संसार चंद नाकामयाब रहा। इसके बाद संसार चंद ने बिलासपुर (कहलूर) रियासत पर हमले की तैयारी की तो बिलासपुर के राजा ने नेपाल के गोरखों से संपर्क के लिए उन्हें मदद को बुलाया। जिस पर अमर सिंह थापा के साथ स्थानीय पहाड़ी राजाओं ने संसार चंद को महल मोरियां के युद्ध में हराया और ईश्वरी सेन को उसके कब्जे से छुडाया। करीब 12 साल तक कैद में रहने के बाद राजा के वापिस आने की खुशी में रियासत के सभी क्षेत्रों के देवी देवताओं को मंडी में बुलाकर शिवरात्रि की शुरूआत हुई थी। तब से इस उत्सव की परिपाटी लगातार जारी है। जिला के विभिन्न क्षेत्रों के देवी देवता अपने रथों के साथ ढोल नगाडों के लोमहर्षक स्वरों से गुंजायमान करते हुए मंडी पहुंचते हैं और सबसे पहले मंडी के सबसे अधिपति देवता माधो राव को नमन करते हैं। माधो राव का मंदिर जिस भवन में स्थित है उसे राजा सूरज सेन (1637 ए.डी) ने बनवाया था। सूरज सेन के 18 लड़के थे लेकिन उसके जीवन काल में ही सभी की मृत्यु हो गई और उतराधिकार के लिए उन्होने एक चांदी की प्रतिमा बनवा कर इसे अपना राज्य सौंप दिया। इस प्रतिमा पर संस्कृत में उकेरा गया है कि ‘सूरय सेन, जो धरती का स्वामी है और दुश्मनों का नाशक है, ने यह दोष रहित पवित्र चक्रधारी और सभी देवताओं के गुरू महान माधो राव को भीमा सुनार से वीरवार 15 फाल्गुन 1705 को यानि 1648 ए.डी. में बनवाया है। लगभग इसी समय कुल्लू के राजा जगत सिंह ने भी अपने राज्य को रघुनाथ जी को इसी तरह सौंप दिया था। इन दोनों राज्यों में संभवतया इसी समय वैष्णव धर्म पहली बार राज्य के धर्म के रूप में घोषित हुआ और राज्याश्रय मिलने के कारण प्रभुत्व हासिल करता गया। जबकि इन दोनों ही रियासतों में हमेशा से शक्ति और शाक्त उपासकों का धर्म अस्तित्व में रहा है। मंडी के अधिष्ठाता देवता भूतनाथ हैं जो शैव परंपरा के प्रभुत्वशाली प्रतीक कहे जा सकते हैं। भले ही राज्य अपना राजकीय धर्म कुछ और घोषित कर दे लेकिन रिआया का धर्म उनकी लोक परंपराओं के अनुसार ही चलता है। मंडी की देव परंपरा के बारे में 1920 में प्रकाशित हुए पंजाब गजेटियर मंडी स्टेट में विवरण मिलते हैं। ब्रिटिश अध्येताओं ने मंडी की देव परंपरा को किस तरह से समझा इसे आपके ध्यानार्थ लाना चाहता हूं।

उपरी पहाड़ी क्षेत्र का धर्म
हिमालयन क्षेत्र में धर्म यूं तो एक विस्तृत विषय है लेकिन इसका खाका कुछ मुख्य लक्षणों से दिया जा सकता है। इसमें मुख्य तत्व निःसंदेह कुल देवता या परिवार का देवता है और इसलिए यह दुर्भाग्यपुर्ण है कि देवता का आम अनुवाद जादू-टोले की क्रियाएं करने वाले देवता के रूप में ले लेने से उसके द्वारा पहाड़ों की धार्मिक व्यवस्था में निभायी जाने वाली महत्वपुर्ण भूमिका असपष्ट और धुंधली हो जाती है। यह सही है कि देवता का शाब्दिक अर्थ छोटा भगवान ही है। लेकिन इसका प्रयोग तिरस्कृत अर्थ में जादू टोना के क्रियाकलाप से संबंधित देवता के रूप में नहीं होता। बल्कि यह छोटे देवता जिसका धर्म पैतृक देवता के गिर्द केन्द्रित होता है और वह उन बड़े देवों से भेद करता है जो आम लोगों की रोजमर्रा की पूजा से बहुत दूर कर दिये जा चुके हैं। इन पैतृक देवताओं का क्षेत्राधिकार व्यक्तिगत और भौगोलिक दोनों ही होता है। प्राचीन समय से अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले गांव, गांवों के समुह और घाटी में वह अपने प्रभुत्व और अधिकार का प्रयोग करते हैं। इतना ही नहीं वह अपनी प्रजा के पुरूष उतराधिकारियों पर प्राधिकार का दावा भी करते हैं। देवता लोगों को अपनी प्रजा या रिआया मानता है। इससे उसका भक्तों के साथ के संबंधों का सही अनुमान लगाया जा सकता है। पहले यज्ञोपवीत के समय से ही परिवार का पुरूष सदस्य उनका अनुगामी बन जाता है। जबकि स्त्री उस समुदाय में शादी करने के बाद देवता की प्रजा बन जाती है। वंशानुगत प्रजा के सदस्य का निवास स्थान बदल जाने से भी वह देवता की सेवा से मुक्त नहीं हो सकता। उसे तब भी अपने परिवार के देवता के प्रति अपने कर्तव्य निभाने होते हैं। हालांकि वह नए घर के स्थानीय देवता को भी मान सकता है। देवता के भक्तों का यह दायित्व होता है कि वह अनाज या पैसों से देवता की पूजा के लिए होने वाले खर्चे में अपना योगदान करे। देवता के आदेशों के आज्ञाकारी होने के नाते विशेष मौकों पर परिवार के एक पुरूष सदस्य का उपस्थित होना जरूरी होता है। इसके बदले में उन्हें मंदिर के प्रबंधन के कार्यों के बारे में बोलने का, देवता के पास जाने का और सामुदायिक पर्वों में भाग लेने का हक होता है।
मंडी में स्थानीय देवता कई बार अधिपति देवता के अधीनस्थ होते हैं और वह रियासत कालीन राष्ट्रीय देवता माधो राव की प्रजा समझे जाते हैं। शिव और काली की कृपादृष्टि से यह देवता ताकत अर्जित करते हैं। पराशर और कमरूनाग भी अधिपति देवता की तरह ही हैं। इनके अंतर्गत अनेकों देवता हैं जो उनके प्रतिनिधी देवता समझे जाते हैं। इन प्रतिनिधी देवताओं के पास उनकी प्रजा सामान्य अवसरों पर आती है। लेकिन प्रतिनिधी देवता और उनकी प्रजा अधिपति देवता के पास होने वाले मेलों, त्योहारों में भाग लेती है। पराशर में यज्ञोपवित की रस्म मंदिर में होती है तो वहीं पर उनके प्रतिनिधी देवताओं के मंदिरों में भी यह रस्म आयोजित होती है। अधीनस्थ देवता किसी नए श्रद्धालु को शामिल कर सकता है। नयी प्रतिमा बनाने पर इनमें जीवन डालने के लिए इसे देवता के रथ पर रखा जाता है।
हर देवता के अध्यात्मिक मंत्री – वजीर, द्वार-पाल और कोतवाल आदि होते हैं। इनमें से वजीर की भूमिका कई बार बहुत महत्वपुर्ण होती है। उसके मंदिर में कई बार अधिपति देवता से ज्यादा मन्नतें मांगी जाती हैं और ज्यादा भेंट चढ़ावा चढ़ता है। लोगों के अनुसार इसका कारण यह है कि उनमें यह मान्यता है कि आम कार्यों को करना वजीर का काम है और इन छोटे मोटे कार्यों से अधिपति देवता को छूट दी जाती है।

पारिवारिक देवताओं की प्रकृति
इसमें कोई संदेह नहीं है कि मंडी के अधिकांश ग्रामीण देवता तमाम पश्चिम हिमालय की तरह नाग समूह से संबंध रखते हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि यह आवश्यक रूप से नाग कहे जाएं। हालांकि कुछ हैं जिनके नाम से ही उनकी प्रकृति उदघाटित हो जाती है। नाग देवता के लिए नरैण या नारायण नाम का प्रयोग होता है। जबकि इसी संप्रदाय के अन्य देवता हिंदू देवताओं के नाम का छ्द्म वेष धारण किए भी मिल जाते हैं। कई बार उनकी असली पहचान पता करना मुश्किल हो जाता है लेकिन उनसे संबंधित मिथकों से उनके जन्म का रहस्योद्घाटन होता है। प्राचीन समय में भगवान कैसा है और उसका चरित्र क्या है के बारे में जब लोगों को खुले संदेह थे तो एक प्रारंभिक कल्पना थी कि वह नाग के प्रकार का होगा और नाग उपासना उस समय दूर-दूर तक फैली हुई थी। हालांकि नाग उपासना के प्रारंभ होने के बारे में अलग-2 सिद्धांत हैं। लेकिन यह दृढ़तापुर्वक निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि हिमालय में पुरातन समय से नाग की उपासना नदी के प्रतीक के रूप में और पानी के नियंत्रक के रूप में की जाती रही है। नाग आज भी पहाडों में मौसम के देवता, झरनों, नदियों-नालों, झीलों और जल स्त्रोंतों के सृजक और संरक्षक माने जाते हैं। क्या जीवित नाग की पूजा से नदी का प्रतीक मानने को स्वीकार्यता मिली? इस प्रश्न के संबंध में निश्चित रूप से जवाब नहीं दिया जा सकता। लेकिन यह संभव है कि सरीसृप के स्वभाव ने संप्रदाय के विकास को प्रभावित किया होगा। इसलिए सभी पानी के स्त्रोतों से इसका संबंध अतुलनीय रूप से महत्वपुर्ण लक्षण है। इसके अलावा अन्य विशेषताएं भी हैं जो नाग उपासना को समर्पित की जा सकती हैं।
नाग और लिंग पूजा शिव और काली की उपासना का वर्णन करती है। इनका बहुत अंतरंग संबंध है और कोई कह सकता है कि पैतृक देवता दोनों में से एक या दूसरे सहयोगी की स्थानीय अभिव्यक्ति है। शिव के रूप में जिन्होने शैव शीर्षक धारण कर लिया है उन्हें शुद्ध और साधारण नागों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। जबकि देवियों के संदर्भ में ऐसा नहीं है। हालांकि वह नाग संप्रदाय से संयोजित और घनिष्ठ संबंध में मिलती हैं लेकिन वह अलग देवता के रूप में कल्पना की गई जाहिर होती हैं।
पैतृक देवताओं में से अधिकांश उपरोक्त दोनों समुहों के अंतर्गत आ जाते हैं। हालांकि विभिन्न प्रकृति के अन्य देवता कभी कभार ही सामने आ सकते हैं क्योंकि अधिक ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में कुल के देवता के एक विभिन्न श्रेणी के देवता में बदलने के लिए बहुत शक्तिशाली कारण और आधार चाहिए होता है। कई बार यह सिद्धांत प्रतिपादित किया जाता है कि इनमें से अधिकांश देवता हिंदू पौराणिक कथाओं के ऋषि या संत रहे हैं। विसंगतिपुर्ण और असंगत होने के कारण इसे खारिज किया जाना चाहिए।
देवता के प्रतीक
मंदिर में लगभग सभी जगह पत्थर की पिंडी या लिंग होता है जो संभवतया प्राचीन प्रतिमा मानी जाती है। लेकिन अब देवता के मंदिर के बाहर जाने और दिखने वाले प्रतीक के रूप में देवता के रथ का प्रयोग होता है। रथ के दो भाग होते हैं। प्रतिमा और दो लकड़ी के पोल (जिन्हें स्थानीय भाषा में आगलियां) जिस पर प्रतिमा उठायी जाती है। यह पोल अक्सर सिल्वर बर्च (भोजपत्र) की बहुत लचीली लकड़ी से बनाए जाते हैं। मुख्य प्रतिमा सोना, चांदी और तांबा धातु के पंक्तिबद्ध मोहरों से बनी होती है। देवता का रथ अधिकांशतया आदमकद होता है और सामान्य तौर पर देवता का प्रतिनिधित्व करता है। त्योहारों के अवसर पर देवता जब रथ के रूप में सामने आता है तो प्रतिमा को कीमती कपडों, आभूषणों और फूलों से सजाया जाता है। अक्सर रथ के उपर कपडे या याक के बालों की छतरी होती है लेकिन मंडी के कुछ देवी-देवता इससे अलग शैली में होते हैं और उनके रथ की प्रतिमा गोलाकार होने के बजाय तिकोनी या पिरामिडिकल होती है। प्रतिमा के बीच से गुजरे लकडी के पोलों को देवता के प्रमुख श्रद्धालुओं द्वारा कंधे पर उठाया जाता है। रथ को कंधे पर उठाने वाले को उस देवता के समाज के समुह का पुरूष सदस्य होना जरूरी है। रथ को कंधे पर उठाने वाले अक्सर हाथों में बिना उंगलियों के दस्ताने पहनते हैं क्योंकि जब देवता की आत्मा हलचल करती हुई और प्रतिमा को एक ओर से दूसरी ओर को पलटती है उछालती है तो रथ के साथ चलने वाले सहायक इसका संतुलन साधने की कोशीश करते हैं लेकिन अक्सर इससे रथ उठाने वालों के हाथ छिल जाते हैं। हरेक देवता के अपने वाद्य यंत्र होते हैं। ढोल, नगाडे और झांझ बजाने वाले हमेशा तो नहीं पर अक्सर निम्न जाति के होते हैं जबकि करनाल, तुरही बजाने वाले हमेशा कनैत या कृषक ब्राह्मण होते हैं।
देवता की आत्मा की जीवशक्ति का संकेत रथ का कंपन और दोलन है। रथ को उठाने वाले इसके प्रभाव में होते हैं और उनकी हल्की से हरकत रथ को पता लग जाती है और देवता ऊपर-नीचे होकर नाचने लगते हैं दोनों ओर लचकते हुए झूमने लगते हैं और अचानक तेजी से आगे बढ़ते हैं क्योंकि उससे प्रेरणा पाने वाले सेवक अपने ऊपर मजबूत होती आत्मा की ताकत को अनुभव करते हैं। कुछ श्रद्धालु दैविय उत्प्रेरणा के कारण मानो जड़वत हो जाते हैं और कुछ देवता की प्रेरणा के कारण प्रतिमा के सामने कांपने, उछलने और चीखने लग जाते हैं। जब एक से अधिक देवता मौजूद हो तो एक दूसरे को हमेशा सम्मान देते हैं। ऐसे अवसरों में आत्मा विशेष रूप से तीव्र होती है और दोनों देवता खुशी की भावना में एक दूसरे को नमन करते हैं। गांव के त्योहारों में तथा अन्य अवसरों पर देवता और उनके श्रद्धालु इकट्ठा होकर नृत्य करते हैं। रथ और वाद्य यंत्र बजाने वाले बजंतरी बीच में नृत्य करते हैं जबकि गूर या अन्य रथ उठाने वाले अधिकारी की अगुवाई में समुह के सदस्य उनको घेरकर नृत्य करते हैं।

भविष्यवाणियां

देवता का मानवीय माध्यम उसका गूर या भविष्यवक्ता होता है और वह देवता की तरफ से बात करता है। गूर असली ताकत का दावा नहीं करता बल्कि वह अपनी शक्ति पूरी तरह से देवता से प्राप्त करता है। जिसके बगैर उसकी अपनी प्रेरणा कोई मदद नहीं कर सकती। मंडी में उसका कार्य आमतौर पर वंशानुगत होता है लेकिन कई बार अपवाद भी होते हैं। लेकिन सभी मामलों में देवता ही अपने माध्यम का चुनाव करता है। बेटा तब तक उतराधिकारी नहीं बन सकता और जब तक पिता को इस पद से वापिस नहीं बुला लिया जाता और वापिस बुला लेने की इस प्रक्रिया में आमतौर पर कई महीने लग जाते हैं। देवता द्वारा बुलाये जाने की प्रक्रिया में अचानक उस पर अधिपत्य हो जाता है और पहला उद्वेग अक्सर उग्र तरीके का होता है। नया गूर भेड़ या बकरे की बलि देता है और उसका रक्त पीता है जिससे वह देवता के नजदीकी संपर्क में जा सके। उसे देवता की देवदार की लकड़ी से बनी चौकी जो बाधा डालने वाले प्रभावों से अवरोधी का कार्य करती है पर औपचारिक रूप से स्थापित किया जाता है। इस पर बैठकर उसे देवता की जिह्वा से सुंदर वचन कहने की अनुमति मिल जाती है। जहां देवता के गूर का पद वंशानुगत नहीं होता वहां पर देवता द्वारा की जाने वाली भविष्यवाणियों के विभिन्न तरीकों में से किसी तरीके का प्रयोग करके नया गूर चयनित किया जाता है। लेकिन यह कल्पना हमेशा संरक्षित की जाती है कि गूर देवता के द्वारा चुना हुआ वाहक होता है।
अधिकांशतया कनैत ही गूर होते हैं लेकिन ग्रामीण ब्राह्मण भी कई बार इस पद पर चुने जाते हैं और कभी कभार कोली भी चयनित होते हैं। कनैतों के पारिवारिक देवता का गूर कोली होने से देवता की मूल प्रकृति के बारे में निष्कर्ष निकालना न्यायोयित नहीं माना जा सकता। गूर का पद खाली होने के दौरान किसी निम्न जाति के व्यक्ति का अचानक उद्वेग में आना उसकी नियुक्ति के लिए पर्याप्त माना जा सकता है।
एक वर्ग के रूप में गूर कुछ वर्जनाओं के तहत कार्य करता है। उन्हें पद पर रहने के दौरान अपने बाल नहीं काटने होते हैं। वह चपड़े के जूते नहीं पहन सकते और जमीन पर हल चलाने या खेती-बाड़ी का काम नहीं कर सकते। कुंवारापन या ब्रह्मचर्य सामान्य नियम नहीं है लेकिन देवता से जरूरी परामर्श करने से पहले व्रत और परहेज रखा जाता है। गूर अपनी भविष्यवाणी नंगे सिर देता है और मंडी के कुछ भागों में छाती भी खुली रखी जाती है लेकिन यह रस्में अलग-2 जगह अलग हैं। कुछ गूर भविष्यवाणी करने से पहले अपने आप को लोहे के जंजीरों से पीटते हैं जबकि अन्य लोहे की सलाई को गालों में से गुजारते हैं। भारी जोश और उतेजना के बीच गूर और सामान्य श्रद्धालु आग पर कूदते हैं मशालें छीन लेते हैं। वह अपने आप को देवता का अस्थाई अवतार समझते हैं और उस समय उन्हें देवता ही माना जाता है।
इस तरह की उत्प्रेरणा अचानक उद्वेग से काफी भिन्न है जो कई बार आलौलिककरण का संकेत देता है लेकिन बहुतया यह अप्रसन्नता या दोष व दुश्मनी को इंगित करता है। भूत के अप्रत्याशित प्रकटन के लिए पीडित का ईलाज किया जाता है और अगर यह अनिष्ट करने वाली साबित होती है तो बुरी आत्मा के लिए या तो झाड-फूंक या शांति के लिए प्रयत्न किए जाते हैं।

हिमालय के भविष्यवक्ताओं या गूरों ने शक्ति प्राप्त करने की वह स्थिती हासिल नहीं की है जो उनके कार्यों की प्रकृति को देखते हुए होनी चाहिए। ब्राह्मणों के वर्चस्व से बचाने में पहाड़ी आदमी काफी चालाक और स्वतंत्र हैं और वह अपने ही पुजारियों के हाथ में पड़ना चाहते हैं। गूर का पद लाभकारी नहीं होता और न ही यह अपनी तरह की कठिनाइयों के बगैर होता है। अगर देवता की व्यवस्था प्रजा को संतुष्ट करने में असफल होती है तो इसका दोष देवता को नहीं दिया जा सकता बल्कि यह उसके मानवीय प्रवक्ता का होता है। अगर गूर अपने तौर तरीकों को ठीक नहीं करे तो उसे पद खाली करना होता है। गूर के कपट को जांचने के लिए चालाकी से नियंत्रण रखा जाता है। गूर का कार्य देवता के फैसलों को संप्रेषित करना और संदेश की दैविय उत्पति सुनिश्चित करना है। जबकि कई बार वह संप्रेषित किए जा रहे फैसले की प्रकृति को नजरअंदाज कर देता है। उदाहरणतया, एक आदमी रोग से ग्रस्त हो गया और उसने देवता से इसके कारणों के बारे में परामर्श किया। इस मामले में या तो कोई डायन, चुडैल या बुरी आत्मा हो सकती है या फिर किसी देवता की दुश्मनी। इसलिए वह मिट्टी के तीन एकसमान गेंद बनाता है। पहले में वह डायन या चुडैल के लिए घास का एक टुकडा डालता है। जबकि दूसरे में भूत-प्रेत या बुरी आत्मा के लिए लकडी का टुकडा और तीसरे में देवता के लिए थोडा सा अन्न डाला जाता है। इसके बाद उत्प्रेरण के आवेश में बाहर इंतजार कर रहे गूर को बुलाया जाता है जो अपना हाथ एक गेंद पर रखता है। वह इसके बाद फिर से बाहर चला जाता है और गेंदों को फिर से अलग रूप में पंक्तिबद्ध किया जाता है। अगर एक ही गेंद को तीन बार छुआ जाता है तो इससे मामले की पूरी तरह से पहचान कर ली जाती है। इस तरह की योजनाओं से बहुत निश्चित सीमाएं उस हद तक बांध दी जाती है जिससे व्यवसायिक माध्यम अपने यजमानों को धोखा दे सकें। इसके अलावा देवता तक पहुंच बनाने के सीधे तरीके भी हैं। जैसे कि उदाहरण के लिए पड़ोसी से विवाद हो जाने के मामले में अपनी नीयत जाहिर करने और इसमें अपने लिए कोई वरदान या कसम इच्छित की जाती है।




...sameermandi.blogspot.com

Friday, 9 February 2018

एक थी रानी खैरीगढ़ी...




एक थी रानी खैरीगढ़ी उपन्यास का पाठ हाल ही में पूरा हुआ। स्वतंत्रता संघर्ष की एक ऐतिहासिक गाथा के रूप में लेखक गंगा राम राजी ने इस उपन्यास का विन्यास किया है। देश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन से पहाड़ भी अनभिज्ञ नहीं थे। बल्कि वह तो देश भर के विभिन्न हिस्सों में चल रहे संग्राम का अभिन्न हिस्सा थे और उन्होने भी अपने स्तर पर सक्रिय भूमिका अदा की थी। उपन्यास के बहाने यह पुस्तक स्वतंत्रता संग्राम का एक दस्तावेज बनकर भी उभरती है। दरअसल रानी खैरगढ़ी के नाम से लगभग हर मंडी वासी परिचित भली भांती परिचित है। लेकिन किसी ऐतिहासिक पात्र के बारे में लिखने के लिए भारी शोध की जरूरत होती है। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि पुस्तक के लेखक ने श्रमसाध्य कार्य करते हुए ऐतिहासिक विवरणों के साथ पात्रों का खूबसूरत प्रयोग किया है। रानी खैरीगढ़ी जिसे मंडी वासी खैरगढ़ी कहते हैं के बहाने इस पुस्तक में मंडी रियासत के इतिहास में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान घटित घटनाओं और आंदोलन में शामिल कान्तिकारियों के बारे में बहुमुल्य जानकारियां मिलती हैं। लेखक ने अपनी शोध दृष्टि के चलते घटनाओं की बाकायदा तिथियां उजागर करते हुए उस समय के दौर को तथ्यात्मक रूप से सामने लाया है। मंडी के राजा विजय सेन के पुत्र भवानी सेन इस रियासत के पहले पढे लिखे राजा थे। रानी खैरगढ़ी जो खैरागढ़ (उतर प्रदेश) से संबंध रखती थी उनकी तीसरी रानी बनी। इस पढी लिखी रानी के मंडी आने पर उन्होने अंग्रेजों व स्थानीय बजीर के शोषण के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। सरकाघाट के टिकरी गांव के शोभा राम के बलवे के समय भी उन्होने मंडी के राजा को प्रजा के दुखदर्द की ओर ध्यान देने और शोभाराम से बात करने को कहा था। शोभाराम का 20 हजार लोगों के साथ मंडी आना और वजीर को जेल में डाल देने का घटनाक्रम हो या अन्य कान्तिकारियों सिधु खराडा, हरदेव, हिरदा राम आदि से पुस्तक में पात्रों के रूप में मिलना एक बहुत खूबसूरत अनुभव है। गदर पार्टी के डा. मथुरा सिंह और गदर पार्टी के समाचार पत्रों का वितरण, मंडी के तल्याहड के नजदीक बम बनाना, पंजाब के क्रान्तिकारियों को बम भेजना, नागचला में राजकोष को लूटने की योजना, क्रान्तिकारियों का पकडे जाना, उन्हे सजा होना और रानी को रियासत से निष्कासित करने के घटनाएं मानो सचित्र सामने आ जाती हैं। हाल में पढ़ा गया यह मेरा तीसरा उपन्यास है। इससे पहले चीनी लेखिका यांग मो का तरूणाई का तराना और फ्रांस के लेखक स्तान्धाल का यथार्थवादी उपन्यास सुर्ख और स्याह पढ़ चुका हुं। इन दोनों विश्व साहित्य की कृतियों को पढते हुए मुझे अनुभव हुआ कि उपन्यास लेखक किसी काल विशेष के घटनाक्रम को पात्रों के माध्यम से सामने रखता है। जिसमें उस काल विशेष के दौर का शब्दों के माध्यम से चित्रण किया होता है और इन शब्दों की उष्मा ऐसी होती है कि मानो कोई चलचित्र पन्नों पर चल रहा है। इन दोनों उपन्यासों सहित इस तीसरे उपन्यास मेें भी मुझे उपन्यास लेखन की यह सब विशेषताएं मौजूद मिली। मुझे अनुभव हुआ कि उपन्यास एक ऐसी विधा है कि जब पुस्तक को हाथ में थाम लिया जाए तो पन्ने कहते हैं कि अभी न जाओ छोड़ कर कुछ और पन्ने पढ लो, मतलब पुस्तक को छोडने का मन नहीं करता लेकिन समय की जरूरतों को देखते हुए पुस्तक के पढ़े हुए पन्नों के बीच पेंसिल को छोड कर इसे अपने से दूर हटाना ही पड़ता है। एक थी रानी खैरीगढ़ी के लेखक गंगा राम राजी को मंडी रियासत की ओर से स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के ऐतिहासिक संदर्भों को पुस्तक में समेटते हुए भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए धन्यावाद, आभार, शुक्रिया और सलाम। पुस्तक के सुंदर प्रकाशन के लिए नमन प्रकाशन और पुस्तक को मुझे पढ़ने के लिए सुलभ करवाने हेतु पिता जी श्री दीनू कश्यप का आभार।
...sameermandi.blogspot.com

मक्सिम गोर्की के उपन्यास माँ का पाठ




मक्सिम गोर्की के प्रसिद्ध उपन्यास माँ को एक बार फिर से पढ़ा। इससे पहले कालेज के दिनों में माँ को पढ़ा था। पुस्तक का पाठ करते हुए कुछ अंशों ने झकझोरित किया। जिन्हें आपके साथ शेयर कर रहा हूँ।

-हमारे बच्चे दुनिया में आगे बढ़ रहे हैं। वे सारी दुनिया में फैल गए हैं और दुनिया के कोने-कोने से आकर वे एक ही लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। जिन लोगों के हृदय सबसे शुद्ध हैं, जिनके मस्तिष्क सबसे श्रेष्ठ हैं वे पाप के ख़िलाफ बढ़ रहे हैं और झूठ को अपने ताकतवर पाँवों तले कुचल रहे हैं। वे नौजवान हैं और स्वस्थ हैं और उनकी सारी शक्ति एक ही लक्ष्य – न्याय – को प्राप्त करने के लिए, व्यय हो रही है। वे मनुष्य के दुख को मिटाने के लिए, इस पृथ्वी पर से विपदा का नाम-निशान मिटा देने के लिए और कुरूपता पर विजय प्राप्त करने के लिए मैदान में उतरे हैं – और विजय उनकी अवश्य होगी। जैसाकि किसी ने कहा है वे एक नया सूर्य उगाने के लिए निकले हैं और वे इस सूर्य को उगाकर रहेंगे। वे टूटे हुए दिलों को जोड़ने के लिए निकले हैं और वे उन्हें जोड़कर रहेंगे।
सच्चाई और न्याय के पथ पर चल रहे हैं, लोगों के हृदय में एक नये प्रेम का संचार कर रहे हैं, उन्हें एक नये स्वर्ग का चित्र दिखा रहे हैं और पृथ्वी को एक नयी ज्योति से आलोकित कर रहे हैं – आत्मा की अखण्ड ज्योति से। इसकी न्यी ज्वाला से एक नये जीवन का उदय हो रहा है, यह जीवन समस्त मानवता के प्रति हमारे बच्चों के प्रेम से उत्पन्न हो रहा है। इस प्रेम की ज्योति को कौन बुझा सकता है? कौन सी शक्ति इसे नष्ट कर सकती है और इसका मुकाबला कर सकती है? इस प्रेम को पृथ्वी ने जन्म दिया है और स्वयं जीवन उसकी विजय के लिए लालायित है – स्वयं जीवन।
- ऐसा मालूम होता है कि जैसे मनुष्य के लिए एक नये ईश्वर का जन्म हुआ हो। हर चीज़ सब के लिए सब एक-दूसरे के सुख-दुख के साझेदार। मैं तो इसे इसी ढंग से समझती हूँ। वास्तव में ही तुम लोग साथी हो, सब एक खून के रिश्ते से बँधे हो, सब एक ही माँ की सन्तान हो और वह माँ है सत्य। पेलागेया निलोवना (माँ)
- हम समाजवादी हैं। इसका मतलब है कि हम निजी सम्पति के ख़िलाफ़ हैं, निजी सम्पति की पद्धति समाज को छिन्न-भिन्न कर देती है, लोगों को एक-दूसरे का दुश्मन बना देती है, लोगों के परस्पर हितों में एक ऐसा द्वेष पैदा कर देती है जिसे मिटाया नहीं जा सकता, इस द्वेष को छुपाने के लिए या न्याय-संगत ठहराने के लिए वह झूठ का सहारा लेती है और झूठ, मक्कारी और घृणा से हर आदमी की आत्मा को दूषित कर देती है। हमारा विश्वास है कि वह समाज, जो इंसान को केवल कुछ दूसरे इंसानों को धनवान बनाने का साधन समझता है, अमानुषिक है और हमारे हितों के विरूद्ध है। हम ऐसे समाज की झूठ और मक्कारी से भरी हुई नैतिक पद्धति को स्वीकार नहीं कर सकते। व्यक्ति के प्रति उसके रवैये में जो बेहयाई और क्रूरता है उसकी हम निन्दा करते हैं। इस समाज ने व्यक्ति पर जो शारीरिक और नैतिक दासता थोप रखी है, हम उनके हर रूप के ख़िलाफ़ लड़ना चाहते हैं और लड़ेंगे, कुछ लोगों के स्वार्थ और लोभ के हित में इंसानों को कुचलने के जितने साधन हैं हम उन सबके ख़िलाफ़ लड़ेंगे। हम मज़दूर हैं, हम वे लोग हैं जिनकी मेहनत से बच्चों के खिलौनों से लेकर बड़ी-बड़ी मशीनों तक दुनिया की हर चीज़ तैयार होती है, फिर भी हमें ही अपनी मानवोचित प्रतिष्ठा की रक्षा करने के अधिकार से वंचित रखा जाता है। कोई भी अपने निजी स्वार्थ के लिए हमारा शोषण कर सकता है। इस समय हम कम से कम इतनी आजादी हासिल कर लेना चाहते हैं कि आगे चलकर हम सारी सत्ता अपने हाथों में ले सकें। हमारे नारे बहुत सीधे-सादे हैः निजी सम्पति का नाश हो – उत्पादन के सारे साधन जनता की सम्पति हों – सत्ता जनता के हाथ में हो – हर आदमी को काम करना चाहिए। अब आप समझ गये होंगे कि हम विद्रोही नहीं हैं।
अदालत में पावेल के भाषण का अंश
- परिवार बसा लेने से क्रान्तिकारी की शक्ति निचुड़ जाती है – इससे उसे कोई मदद नहीं मिल सकती। बच्चे, तंगदस्ती, बाल-बच्चों का पेट पालने के लिए काम करने की ज़रूरत। क्रान्तिकारी को अपनी शक्ति बचाकर रखनी चाहिए ताकि ज़्यादा काम कर सके। यह वक़्त का तकाजा है। - हमें हमेशा सबसे आगे चलना चाहिए, क्योंकि हम व मज़दूर हैं जिन्हें इतिहास ने पुरानी दुनिया को बदलकर उसकी जगह एक नयी दुनिया बनाने के लिए चुना है। अगर हम पीछे रह जायें, थककर या अपनी किसी छोटी-सी विजय पर सन्तोष करके बैठे रहें, तो हम एक ऐसे अपराध के दोषी होंगे जो अपने लक्ष्य के साथ विश्वासघात से कम नहीं है। कोई दूसरा ऐसा नहीं है जिसके साथ हम अपने ध्येय को हानि पहुँचाये बिना चल सकें, और हमें इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमारा लक्ष्य कोई छोटी-मोटी जीत नहीं, बल्कि पूर्ण विजय है।
निकोलाई की माँ से बातचीत
- मुमकिन है कि मैं जो कुछ कह रहीं हूँ वह आपको बेवकूफ़ी की बातें मालूम हो रही हों, लेकिन मैं यह यकीन करती हूँ कि ईमानदार लोग अमर होते हैं, मैं समझती हूँ कि जिन लोगों ने मुझे यह शानदार जीवन बिताने का सुख दिया है वे अमर हैं – ऐसा जीवन जो अपनी आश्चर्यजनक जटिलता से, अपने विभिन्न रूपों के वैविध्य से और उन विचारों के विकास से जो मुझे अपने प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं, मुझे रोमाचित कर देता है। शायद हम लोग अपनी भावनाओं को बहुत सम्भालकर रखते हैं। हम लोग अपने विचारों को बहुत ज़्यादा महत्व देते हैं, इसलिए हमारा व्यक्तित्व पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता। हम चीज़ों को अनुभव करने के बजाय उनकी मीमांसा करने लगते हैं
साशा का माँ, निकोलाई और सोफिया से वार्तालाप
- नताशा तुम सच कहती हो। माँ ने कुछ सोचते हुए कहा। लोग इस उम्मीद में ज़िन्दा रहते हैं कि आगे चलकर उनका जीवन बेहतर होगा, लेकिन अगर भविष्य के लिए कोई आशा न हो तो फिर किस काम की ऐसी ज़िन्दगी? और माँ ने लड़की का हाथ थपककर कहा, तो अब तुम अकेली रह गयी? बिल्कुल अकेली। नताशा ने लापरवाही से कहा। कोई बात नहीं। माँ ने थोड़ी देर बाद मुस्कराकर कहा। अच्छे लोग ज़्यादा दिन तक अकेले नहीं रहते – कोई न कोई उनके साथ हो ही जाता है।
- यह तो मैंने भी देखा। उक्रइनी ने उचाट स्वर में कहा। शासकों ने लोगों के दिमागों को ज़हरीला बना दिया है। जब जनता जाग उठेगी तब वह हर चीज़ को ढा देगी। उसे तो बस साफ़ ज़मीन चाहिए, अगर वह साफ़ नहीं होगी तो जनता उसे साफ़ कर देगी। वह हर चीज़ को जड़ से उखाड़ फेंकेगी।
- यह है हमारी ज़िन्दगी। देखती हो लोगों को किस तरह एक-दूसरे का दुश्मन बना दिया गया है? मर्जी न होते हुए भी लोग किसी को मार देते हैं। और जिसे मारते हैं वह कौन होता है? कोई बेचारा मजबूर, जिसे ख़ुद भी हमसे ज़्यादा अधिकार नहीं होते। वह तो हमसे भी ज्यादा अधिकार नहीं होते। वह तो हमसे भी ज़्यादा अभागा होता है, क्योंकि वह बेवकूफ़ भी होता है। पुलिस, राजनीतिक पुलिस और जासूस सब हमारे दुश्मन हैं। लेकिन वे सब हमारे ही लोग हैं, जिनका ख़ून हमारी ही तरह चूस लिया जाता है और जिन्हें हमारी ही तरह तिरस्कार से देखा जाता है। हम सब एक जैसे हैं। लेकिन हमारे मालिकों ने लोगों को एक-दूसरे का दुश्मन बना दिया है, उन्हें भय और दुनिया-भर की खुराफात से अन्धा बना दिया है, उनके हाथ-पाँ बाँ दिए हैं, निचोड़-निचोड़कर उनका ख़ून चूस लिया है, और वे उन्हें एक-दूसरे को मारने और कुचल देने पर मजबूर करते हैं। उन्होंने लोगों को बन्दूक, डण्डा और पत्थर बना दिया है, और कहते हैं, यही राज्यसत्ता है...
माँ, यह अपराध है। लाखों लोगों को इस तरह बेरहमी से मार डालना, मनुष्य की आत्मा को कुचल देना...समझ में आता है तुम्हारी? ये लोग आत्मा के हत्यारे हैं। तुम उनमें और हममें अन्तर देखती हो? जब हम किसी को मारते हैं तो वह घृणा, लज्जा और कष्ट की बात होती है – सबसे बढ़कर घृणा की। लेकिन वे पलक झपकाये बिन, बेरहमी के साथ, किसी संकोच के बिना हज़ारों लोगों को जान से मार देते हैं और बिल्कुल सन्तुष्ट रहते हैं. लोगों को इस तरह कुचलकर रख देने का उनके पास बस एक बहाना यह है कि वे अपने सोने-चाँदी, अपनी हुँडियों और उन तमाम मनहूस चीज़ों की रक्षा करना चाहते हैं जिनकी सहायता से वे हमें गुलाम बनाते हैं। ज़रा सोचा – जब वे लोगों को जान से मारते हैं और उनकी आत्माओं को कुचलकर रख देते हैं तो वे अपनी जान बचाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी जायदाद बचाने के लिए ऐसा करते हैं। उन चीज़ों को बचाने के लिए जो मनुष्य के अन्दर नहीं बल्कि मनुष्य से बाहर होती है...
जासूस इसाई की हत्या की सूचना मिलने पर पावेल का माँ और उक्रइनी से वार्तालाप
- यही छोटे-छोटे मोटी तोंदवाले लोग सबसे बड़े पापी हैं और यही सबसे ज़हरीली जोंकें हैं जो जनता का ख़ून चूस रही हैं। पीसीसियों ने इन्हें बुर्जुआ का नाम ठीक ही दिया था...इस बात को याद रखना, माँ...बुर-जुआ, क्योंकि वे बिल्कुल जुए के समान हैं, जिन-जिन लोगों के भोलेपन का वे फ़ायदा उठा सकते हैं उन पर वे वार करते हैं और उनका ख़ून चूसते हैं...
तुम्हारा मतलब है कि यह सब कुछ पैसेवाले करते हैं? माँ ने पूछा।
हाँ। यह उनका दुर्भाग्य है कि वे पैसेवाले हैं। अगर बच्चे के खाने में तांबा मिलाते रहो तो उसकी हड्डियों की बाढ़ मारी जाती है और बच्चा बौना रह जाता है, लेकिन जब किसी आदमी को सोने का ज़हर दिया जाता है, तो उसकी आत्मा बौनी रह जाती है – छोटी और गन्दी और बेजान, रबर की उन गेंदों की तरह जो बच्चे पाँच-पाँ कोपेक की ख़रीदते हैं...
पावेल और माँ का वार्तालाप
- इस दुनिया में कोई भी ऐसा है जिनका दिल कभी न दुखा हो? उक्रइनी उठा और सिर हिलाते हुए मुस्कराकर बोला। मुझे इतना दुख दिया गया है कि मैंने अब ध्यान ही देना छोड़ दिया है। जब लोग हैं ही ऐसे तो हो ही क्या सकता है? अगर आदमी इन सब बातों की तरफ़ ध्यान देने लगे तो उसके काम में हर्ज होने के अलावा कुछ नहीं होता और इन बातों पर कुढ़ना अपना वक़्त ख़राब है। ज़िन्दगी का ढंग ही कुछ ऐसा है। पहले मैं भी लोगों से नाराज़ हो जाया करता था, लेकिन फिर मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि यह सब बेकार है। हर आदमी डरता है कि उसका पड़ोसी उसे खा जायेगा, इसलिए वह पहले खुद ही उस पर वार करना चाहता है। मेरी माँ, ज़िन्दगी का ढंग ही ऐसा है।
- आपमें से जो लोग कहते हैं कि हमें हर बात जाननी चाहिए वे ठीक हैं। हमें अपने अन्दर ज्ञान की ज्योति जगानी चाहिए, ताकि वे लोग जो अँधेर में भटक रहे हैं वे हमें देख सकें। हमारे पास हर चीज़ का सच्चा और ईमानदार जवाब होना चाहिए। हमें पूरी सच्चाई और पूरे झूठ की जानकारी होनी चाहिए...
- तो तुम करना क्या चाहते हो? माँ ने उसकी बात काटकर पूछा।
पहले ख़ुद पढूँगा और फिर दूसरों को पढ़ाऊँगा। हम मज़दूरों को पढ़ना चाहिए। हमें इस बात का पता लगाना चाहिए और इसे अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि हमारी ज़िन्दगी में इतनी मुश्किलें क्यों हैं।
यह पुस्तक परिकल्पना प्रकाशन ने प्रकाशित की है। इसे हासिल करने के लिए जनचेतना के साथी Manan Vij, Namita, Manav से संपर्क किया जा सकता है या इसे जनचेतना के पते डी-68, निरालानगर, लखनऊ- 226020 से प्राप्त किया जा सकता है।
...sameermandi.blogspot.com

मंडी में बनाया जाए आधुनिक पुस्तकालयः शहीद भगत सिंह विचार मंच

मंडी। प्रदेश की सांस्कृतिक और बौद्धिक राजधानी मंडी में आधुनिक और बेहतरीन पुस्तकालय के निर्माण की मांग की गई है। इस संदर्भ में शहर की संस्...